काश,
फिर वही अलसायी भोर
वही मस्तानी शाम होती 
उस अनदेखे- अनजाने संग
 कभी हँसती कभी रोती!
पढ़ने के बहाने फिल्मी गीत
 और शायरियां लिखती 
कभी गुनगुनाती कभी शरमाती
घंटों मन ही मन बतियाती
सखियां सारी पगली बताती!!
 कहां होगा? कैसा होगा?
मे ही, रैन बीत जाती
पता ही न चलता, 
कब चिड़ियाँ चहचहाती?
कभी चाय उबल उबल कर
 खत्म ही हो जाती...
होश आता,
जब माँ चिल्लाती!
सारी दुनिया दुश्मन नजर आती....
वो पॉकेट ट्रांजिस्टर 
जो था सच्चा साथी, 
छाया गीत सुनते ही 
ज्यों प्राणवायु आती- 
सारंगा तेरी याद में 
नैन हुए बेचैन....
             -कीर्ति प्रदीप वर्मा