(गतांक से आगे ,
जैसा कि आपने पढ़ा कि_
शादी के बाद ,मालिनी का चचेरा भाई ,मालिनी के साथ रहने आ गया था।)
मालिनी ने पुराने सारे नौकरों को हटा कर ,नए नौकर नियुक्त किए। मेरे पिता ने विरोध किया ,क्योंकि वो सब बहुत पुराने, और विश्वस्त नौकर थे,लेकिन मालिनी ने मुझे मना लिया और मैंने पिता जी को।
एक दिन ,जब मैं लौट कर आया पिता जी का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो चुका था,उनकी आंखें बाहर को निकली हुई थी।
मालिनी दहाड़े मार कर रो रही थी,और उसका चचेरा भाई उसे ढांढस बंधा रहा था था।
मेरा तो जैसे सबकुछ खत्म हो गया था,पिता जी मेरी सांस थे। पिता जी के जाने के बाद मुझे बड़े बुरे बुरे ख्याल आते थे।
पूरे घर में पता नही क्यों एकदम मनहुसियत
का साया पांव पसारे हुए था।
मैं अवसाद में घिरता जा रहा था,लेकिन मालिनी अपनी दुनिया में व्यस्त थी।रोजाना अपने चचेरे भाई को लेकर बाहर जाती,देर रात तक लौटती,मैं कुछ बोलता तो वह मुझपर हावी हो जाती।मेरे उपर अंग्रेजों का बहुत दबाव था,समय पर लगान ,गांव वालों से लेकर अंग्रेजों को देना,कुछ रिश्तेदारों को नजर मेरे जमीन पर थी,उनसे भी निपटना।
एक दिन मालिनी मेरे पास एक पंडित (कम, तांत्रिक ज्यादा लग रहा था )को ले आई।उसने कहा, ये तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए पूजा पाठ करेंगे।
नीचे इसी तहखाने में अनुष्ठान शुरू हुआ,वह तांत्रिक एक छोटे से शीशे का मुंह बार बार मेरी ओर कर के कुछ कुछ मंत्र बोल रहा था।
अनुष्ठान खत्म होने के बाद ,मेरी(विवेक) तबियत ज्यादा ही खराब होने लगी।
अब मैं ज्यादा ही लेटा रहता था,धीरे धीरे घर ,कारोबार,हवेली सब कुछ की बागडोर मालिनी और उसके चचेरे भाई के हाथ में आ गई ।
एक रात अचानक मेरी नींद प्यास के मारे खुल गई,मालिनी कमरे से नदारद थी। मैं उठकर पानी लेने किचन में गया,मुझे तहखाने की तरफ से जोर जोर से बात कर हंसने की आवाज सुनाई दी।
मैं दबे पांव सीढ़ियों से उतर तहखाने के दरवाजे के पास पहुंचा ,वहां मालिनी तांत्रिक और उसका चचेरा भाई आपत्तिजनक अवस्था में दिखे।
तभी मालिनी की आवाज आई, कितनी आसानी से उस रईसजादे को मूर्ख बना उसकी सारी दौलत हमलोगों ने हथिया ली।
और सब हंसने लगे।
चचेरा भाई हंस कर बोला_ सच में मालिनी तुम्हारा कोई जवाब नहीं,मैं और तुम भाई बहन की आड़ में उसके पीठ पीछे अय्याशी करते रहे और वह अंधा बना कुछ समझ ही नहीं पाया।
लेकिन उस बुड्ढे की नजर से हम बच ना सके,उसने हमें बेडरूम में रोमांस करते हुए देख लिया था ,और उसका खामियाजा उसे जान देकर चुकानी पड़ी।
तांत्रिक ने कहा , वाह क्या बात है!अब तो सारा कुछ मालिनी मेरी जान तुम्हारा ही है।
मालिनी ने आंखे गोल गोल घुमाते हुए , विजयी मुस्कान के साथ कहा ,वो तो है ही। और कहने लगी _अच्छा ही हुआ, बुड्ढा दिन रात हमारी हरकतों पर नजर रखे था,उस दिन तो हमारा भांडा फूट ही जाता,अगर उसका काम तमाम नही किया जाता।
तांत्रिक ने कहा _सही है ,अब वो विवेक ,(तुम्हारा पति) पूरी तरह कब्जे में है ।अब वो एक जिंदा लाश ही है।
बहुत देर तक मैने अपने आप को संयत किया था ,मेरी मुट्ठियां भिंच गईं थीं,अंदर जैसे बारूद फट रहा था,और उन सभी लोगों की बेहयाई हंसी देख, जब मैं खुद को काबू में नहीं रख पाया, तो मैंने अंदर प्रवेश किया। मुझे देख वे लोग चौंक गए।
लेकिन मालिनी निर्लज्ज बैठी रही ।मैने वहीं टंगी तलवार उठा ली,और मालिनी की ओर दौड़ा,_कुलटा ,लालची औरत मेरे प्यार में क्या कमी थी,तुझे मैने जी जान से प्यार किया था। अब मैंने जाना कि तू मेरे प्यार के लायक ही नहीं थी।अब मैं तुझे नहीं छोडूंगा।
अचानक एक गोली आई और मेरे सीने को पार कर गई। उसके (चचेरे भाई ,कहना अब रिश्ते का अपमान होगा ) आशिक ने रिवाल्वर निकाल मुझ पर गोली चला दी।
सब कुछ अप्रत्याशित था। मैं गिर पड़ा।
तांत्रिक चिल्लाया _अरे मूर्ख तूने इसकी हत्या कर दी।
मैने इसपर त्राटक कर रखा था,यह मेरे बस में था ,अब इसकी रूह यहीं रहेगी और ये हम तीनों को मार देगा।यह मर कर भी नहीं मरा।
ऐसा करो,तुम लोग हवेली से निकलने की तैयारी करो ,मैं इसे संभालता हूं।
जाओ जल्दी जाओ ,तांत्रिक चिल्लाया।
मालिनी और रंजीत (उसका भाई)जल्दी जल्दी सारे कागजात,गहने जेवरात बटोरने में लग गए।सब कुछ पा कर भी उन्हें हवेली छोड़नी पड़ रही थी।
कहते हैं न पाप से अर्जित की गई संपत्ति का उपभोग करना आसान नहीं है,वह धन संपत्ति किस काम कि, जिसे पाने के लिए कितनों का दिल दुखे और कितनों की लाशों से गुजरना पड़े।
वे हवेली छोड़ हरियाणा के रोहतक में बस गए,और तांत्रिक ने मेरी रूह इसी आईने में कैद कर दी। मैं इस आईने में कैद हूं और तब तक रहूंगा जब तक तांत्रिक के पास का वो छोटा शीशा किसी तरह टूट न जाए।
विवेक अपनी कहानी सुना चुप हो गया।
मानस ने कहा _मैं तुम्हारी मदद अवश्य करूंगा। बताओ मुझे क्या करना होगा??
विवेक ने कहा _बस तुम किसी तरह उन्हें इस हवेली तक ले आओ।
मानस ने कहा _जरूर।
फिर मानस को विवेक ने उस त्रिआयामी दुनिया से वापस भेज दिया।
मानस तहखाने में वापस आ चुका था।उसने दरवाजा बंद किया ,और वापस अपने कमरे में आ गया।
दो दिन बाद प्रतियोगी परीक्षा थी।वह पढ़ने में लग गया।परीक्षा देने के बाद उसने अपने दोस्त नीरज से संपर्क किया,और मकान मालिक का फोन नंबर देने को कहा, क्योंकि
नीरज भी मकान मालिक से नहीं मिला था,सिर्फ हिदायतें और चाभी ही एजेंट के माध्यम से नीरज को पकड़ाई गई थी।
नीरज ने एजेंट को फोन कर मकान मालिक का फोन नंबर लिया।
मानस ने फोन नंबर ,उधर से महिला की आवाज आई_कौन?
मानस ने कहा_हैलो मैं आपका किराएदार बोल रहा हूं।
मुझे आपसे जरूरी बात करनी है।
उधर से आवाज आई _ क्यों?
मानस ने नम्रता से जवाब दिया_ऐसा है मैडम कि , मैं आपकी यह हवेली खरीदना चाहता हूं।
परंतु मैं ये हवेली नहीं बेचना चाहती_मालिनी ने उधर से कहा।
मैडम मैं आपको हवेली के 10करोड़ दूंगा।
उधर पीछे से मानस को एक पुरुष आवाज आई, किससे बात कर रही हो,डार्लिंग।
मालिनी ने थोड़ी देर में मानस को फोन करने को कहा।
सुनो ,रंजीत वो किराएदार हवेली खरीदना चाहता है_मालिनी ने कहा।
रंजीत ने कहा मालिनी पागल हो गई हो,तहखाना भी तो हवेली में ही आता है,अगर उसने खोला तो कई दफन राज बाहर आ जायेंगे।
लेकिन रंजीत ,हवेली बेकार पड़ी है,कोई किराए में भी नही लेता था,हम उसमें रह नही सकते।अगर ये बिक जाए तो हमारे लिए अच्छा हो जाएगा।
और 10करोड़ मिल भी रहा है,सौदा बुरा तो नहीं।
और तहखाने का मैने सोच लिया है,हम उस भाग को नहीं देंगे।वो हिस्सा हमारे कब्जे में ही रहेगा।
रंजीत ने कहा ,अरे वाह खूबसूरती और दिमाग में तुम्हारा कोई जवाब नहीं।
मालिनी ने इस बार खुद मानस को फोन मिलाया।
(मानस इंतजार ही कर रहा था,उसे पता था कि जो चारा उसने फेंका है,उसमें ये चिड़िया जरूर फंसेगी।,और ऐसा ही हुआ।)
मालिनी _हैलो ,मानस जी बोल रहे,हमें सौदा मंजूर है,लेकिन मुझे हवेली के 12 करोड़ चाहिए और नीचे तहखाने का हिस्सा हमें नहीं बेचना।
मानस ने फिर चाल चली ,उसने और भी रुपए बढ़ा दिए,उसने कहा 14करोड़ लीजिए और ये हवेली पूरी तरह मेरे हवाले कर दीजिए।
मालिनी लालच में आ गई।उसने कहा हमें कल तक का समय चाहिए ,सोचने का ।
मानस ने कहा कोई बात नहीं,आराम से सोच लीजिए।
मालिनी ,शेखर और तांत्रिक तीनों मिल कर विचार विमर्श करते हैं ,बाद में फैसला होता है कि हवेली का कागज तैयार करवा ,मानस को यहीं बुला लेते हैं ,हम में से कोई हवेली नहीं जाए।
अगले दिन मालिनी को फोन कर ये कहा कि ,आप यहीं आ जाओ ,हम हवेली के पेपर साइन कर आपको यहीं हमारे घर (रोहतक में वो लोग रहते थे)पर दे देंगे।
मानस ने कहा _लगता है ,आपलोगों को सौदा मंजूर नहीं है , वरना इतनी शर्तें न रखते।
मैं अभी यहां से कहीं नहीं जा सकता ,क्योंकि कभी भी मुझे परीक्षा ,या इंटरव्यू के लिए बुलाया जा सकता है ,मानस ने कहा।
काफी न नुकुर के बाद मालिनी आने को तैयार हो गई।
मानस की योजना कुछ हद तक पूरी होती दिख रही थी।
मालिनी , रंजीत और तांत्रिक तीनों आए।वो तीनों काफी बूढ़े हो चुके थे,लेकिन चालबाजी उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी।पहले उन्होंने अंदर आने से मना कर दिया।
फिर मानस के जोर देने पर मालिनी ,रंजीत तो अंदर आ गए ,लेकिन तांत्रिक बाहर ही रुका रहा।
मानस ने उनका बहुत अच्छे से सत्कार किया ,मानस बहुत वाकपटु था।बातों बातों में वो उनलोगों को तहखाने तक ले गया।
मालिनी ने देखा , कमरे में ताला लगा है ,उसने चैन की सांस ली।मानस ने उस कमरे की चाभी मांगी ।मालिनी ने कहा ,इसकी चाभी तो खो गई है ,और इस कमरे को अच्छा होगा आप न ही खोलें।
इधर उनकी आंख बचा कर मानस ने दरवाजे का ताला खोल दिया।
अचानक एक धूल भरी आंधी आई और उन दोनो को अंदर खींच ले गई।
वो दोनो चिल्लाने लगे,बचाओ बचाओ,तांत्रिक दौड़ा दौड़ा आया ।
उसने देखा शीशे से दो हाथ निकल उनकी गर्दन दबा रहा था।
तांत्रिक ने तुरंत अपने पास से वह छोटा शीशा निकाला ,जिससे उसने त्राटक किया था ।वह तेज तेज मंत्र पढ़ने लगा ,जिससे उस हाथ की पकड़ ढीली हो गई।
मानस को अचानक क्या सूझा ,उसने एक लाठी तांत्रिक के शीशे की ओर,दे मारा ,निशाना सही लगा ,शीशा नीचे गिर कर चकनाचूर हो गया।
अब विवेक उस ड्रेसिंग टेबल के शीशे से आजाद हो गया।उसने तीनों को मार दिया , तीनों राख में बदल गए,और इस तरह विवेक का बदला पूरा हुआ।
मानस को धन्यवाद कह ,विवेक भी गायब हो गया,जैसे वहां कुछ हुआ ही नहीं था।
समाप्त

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