बचपन के दिन भी क्या दिन थे! हम अपने दिल के बादशाह होते थे। हमारे तो दो ही काम होते थे या तो पढ़ाई या फिर खेल। स्कूल की पढ़ाई कर घर आते। हाथ -पैर  धोकर ,कपडे बदलकर माँ जो खाने देती खाकर खेलने मैदान में चल देते थे। हमारे पिताजी रेलवे में अफसर थे।
उनका हर दो तीन साल में तबादला होता रहता था। हम जहाँ जहां जाते वहाँ बंगला तैयार रहता था। इस तरह पिताजी का करीब दस जगहों पर तबादला हुआ। तब हम काफी छोटे बच्चे थे। नौकरी के आखिरी दौर में पिताजी का विभाग स्थाई रेलपथ से बदलकर संरक्षा (सेफ्टी) विभाग में हो गया था।  उनका तबादला खड़गपुर शहर (पश्चिम बंगाल ) ,में हो गया था।उस विभाग में तबादले नहीं होते थे। अतः उन्होंने अपने सर्विस के १२ वर्ष वहीं काटे और रिटायर हुए। 
       जब हम खड़गपुर आये थे ,तब मेरी उम्र कोई बारह वर्ष की  रही होगी । तब रेलवे ने बंगले की जगह फ्लैट्स बनवाना शुरू किया था। अफसरों को विशाल फ्लैट दिये जाते थे। खैर, हमें भी एक फ्लैट दिया गया । वहीं हमारा बचपन और किशोरावस्था भी गुजरा। पंद्रह साल उस फ्लैट में गुजर गये थे। हम भाई बहन दस बारह साल की अवस्था  से करीब पंद्रह वर्ष गुजारे थे। उस फ्लैट के कोने- कोने से हमारी बचपन की  यादें जुड़ी हुई थी। हमारा एक चिल्ड्रन्स रूम (बच्चों का कमरा) था। उसमें हमारी कितनी यादें समय के दरख्त में बंद पड़ी हुई है। हमारे कमरे में एक दीवाल में बना शेल्फ होता था,जिसमें चार तह होते थे। वह हमारे स्कूली किताबों के रखने का शेल्फ था। हम पांच भाई बहन उसे एक एक के हिसाब से बाँट लिये थे। जो सबसे बड़ा उसका सबसे ऊपरवाला और सबसे छोटे का सबसे नीचेवाला शेल्फ होता था। पर चूंकि चार शेल्फ थे और हम पाँच थे, इसलिये सबसे नीचेवाला शेल्फ सबसे छोटे दो भाइयों में आधा आधा बँटा था। अब नीचेवाले शेल्फ को बीच में एक लाईन खींचकर दोनों का इलाका बाँट दिया जाता था। वह लाईन क्या भारत -पाकिस्तान  के बीच लाईन ऑफ कंट्रोल (एलओसी ) था।  लाईन पार कर किसी की चीज इधर उधर नहीं जा सकती। अपने ही क्षेत्र में उन्हें  अपना कापी किताबें,पेंसिल पेन ,दवात , कंचे, बॉल सब.रखने पड़ते। अगर कोई सीमा का उल्लंघन किया तो फिर हम अमरीका जैसे  बड़े भैया के पास फरियाद आ जाती। हम सुलह कराने की कोशिश करते, पर उसकी उम्मीद न के बराबर होती। तब हम उनको अस्थायी रूप से हमारे शेल्फ में थोड़ी जगह इस शर्त पर देते कि एक निश्चित अवधि के अंदर माँ पिताजी के पास फरियाद कर कुछ व्यवस्था करे। 
अब हमारे सबके शेल्फ एक म्यूजियम ही होते थे। हम किसी रंगीन पेंसिल  से अपना नाम लिखकर या कागज पर नाम लिखकर उसे चिपकाकर अपना शेल्फ का नामांकन कर लेते। उस शेल्फ की दीवारों पर विभिन्न देवी देवताओं के फोटो,अपने पसंदीदा फिल्म अभिनेताओं के फोटो चिपकाते थे।  दीवार के बीचोंबीच स्कूल का टाइमटेबल चिपकाते थे। किताबों के साथ -साथ हम अपनी खेलने की चीजें ,कंचे, खिलौने सब वहीं रखते थे। हमारे सभी शेल्फ में एक छोटी हनुमान चालीसा जरूर होती थी ,जो हम पांचों को पिताजी ने एक- एक  दिये थे।  ऐसा था हमारा किताबों का शेल्फ। अपने कमरे को हम अपने ढंग से सजाते थे।
इसी तरह हमारे प्रार्थना घर में रोज शाम को पूरा परिवार सामूहिक प्रार्थना करता था। वहाँ भी हम सब अपने अपने स्थान नियत कर लिये थे,दीवारों पर नाम लिखकर। किचन में भी हम सबका एक नियत कार्नर होता था।  इस तरह घर के कोने कोने में हम अपना नाम लिख देते। कभी कभी वे नाम सालों.तक नहीं मिटते थे। ऐसे ही कई घर का हर दीवार और हर कोना हमारे  कारनामे का साक्षी होता था। लगता कि वे दीवारें और कोने बोल उठेंगी। ऊपर इतना विवरण देने का उद्देश्य यह बताना था कि घर का एक एक कोना हमारे बचपन की  मधुर यादों से जुड़ा हुआ था।
      समय के साथ हम बड़े हो गये और नौकरी, शादी आदि के चलते घर से दूर हुए। पिताजी भी रिटायर हो गये और हमने वह रेलवे फ्लैट छोड़ दिया। फिर कितने ही लोग उस घर में रहे होंगे!
  हमारे पिताजी जितने स्थानों में सर्विस  किये उन स्थानों को अगर हमारा कभी जाना होता, तो हम जरूर उस स्थान में  हमारे पुराने घर को जाकर देख आते और हमारे उस घर से जुड़ी यादों और भावनाओं को फिर से ताजा कर लेते। यह हमारा हमेशा का नियम था। उस घर में जो भी रेलवेकर्मी रहते वे भी हमारा आवभगत करते और हमारी यादगार पलों को सुनते।
  हमें  खड़गपुर छोड़े पच्चीस छब्बीस वर्ष हो गये थे। कभी पाँच छः साल में अगर हम किसी काम से वहाँ जाते तो जरूर वह घर देखकर यादें ताजा करते। यह हमारे सभी भाई बहनों का नियम था। मैंने खड़गपुर छोड़ने के बाद कोई आठ साल पहले वह घर देखा और उसमें रहनेवालों से मिला। एक दीवाने की तरह एक एक कोना देखकर खयालों में खो जाता। उस घर में रहनेवाले सज्जन भी मेरे मन की हालत समझकर उन संवेदनाओं को अनुभव कर रहे थे। उन्होंने मेरा स्वागत सत्कार किया।
उसके बाद आज बीस साल बाद किसी काम से मैं खड़गपुर गया। काम निपटाकर शाम को मैं उस कॉलोनी की तरफ गया। देखा कि सब बदला बदला हुआ था। वहाँ कॉलोनी के पास की छोटे होटल, पान दुकान ,किराने की दुकान कुछ नहीं थे। मैंने एक आदमी को जो दूसरी ओर जा रहा था, रोककर पूछा कि वहाँ  रेलवे का साउथ साइड कॉलोनी हुआ करता था,तो उसने बोला नहीं यहाँ कोई कॉलोनी नहीं है। मैं पैदल चलते हुए आगे कोई आधा किलोमीटर जाकर देखा तो वहाँ कुछ फ्लैट्स थे ,पर सब टूटे फूटे और वीरान थे। कहीं एक व्यक्ति भी नजर नहीं आ रहा था। फिर भी मैंने आगे बढ़कर वह हमारा फ्लैट खोज ही लिया। उस पर  सफेद वृत्त पर काले रंग से रंगा नंबर  S/4/2 अंकित था। हाँ , यही तो हमारा फ्लैट था। अब उसमें दरवाजे नहीं हैं, खिड़कियाँ नहीं हैं ,दीवारें जगह जगह से टूट रहे हैं। मैं वहाँ खड़ा एकटक उस घर को देख रहा था। अपने बचपन की यादों में मैं खो- सा गया था। अब वह घर ही नहीं, पूरा कॉलोनी वीरान था।
तभी एक व्यक्ति साइकिल से जाते  हुए मेरे पास रुका और पूछा -"बाबूजी,  क्या देख रहे हैं?" मैंने उससे कहा कि कभी हम यहां रहा करते थे। उस व्यक्ति ने कहा -"अब यहां कोई नहीं रहता।"
बात यह थी कि उन फ्लैट्स को बनाये साठ सत़्तर साल हो चुके थे ,अतः उन्हें खाली करवाकर तोड़ दिया जायेगा और फिर नये फ्लैट्स बनेंगे।
मैं जड़वत् खड़ा होकर उस फ्लैट के  पुराने दीवारों को देख रहा था, जो मेरे बचपन का बयां कर रहे थे। शाम गहरी हो चुकी थी। मेरे आंखों में आंसू थे। भारी मन से मैं लौटने के लिये मुड़ा।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "