तोहार बापू अब ना अयहन,अब हम जा तनी बबुआ।आपन ख्याल रखिहा।
मृत्यु शैय्या पर लेटी रामकली के प्राण पखेरू इतना कहते उड़ गए।
बहुत इंतजार किया था,उसने अपने पति का।
जब से विवाह करके आयी थी गरीबी ही देखी।ससुर जी बीमार रहते,सब कहते बीड़ी मत पीयो।कलेजा जल जाएगा,लेकिन सुनते कहां थे।
रामकली की गोद में माधो को डाल सरजू परदेश चला गया था,फिर वो कभी वापस नहीं आया।
रामकली ने बड़े संघर्ष के बाद पाल पोस कर माधो को बड़ा किया।अकेली जान कमाती,सास ,ससुर की सेवा करती ,सास हमेशा ताने देती ,आते ही मेरे लड़के को खा गई ,इसी डायन के मारे मेरा सरजू परदेश चला गया,और कभी वापस नहीं आया।
कुछ दिन ही बाद ससुर भगवान के प्यारे हो गए।सास दिन भर बड़बड़ाती ,अब तो रामकली सब अनसुना कर देती ।
एक दिन ऐसे ही सास भी चली गई।
अकेली रह गई थी ।
मुंगेर के एक छोटे से गांव में ब्याह कर रामकली आई थी ।तंगहाल जिंदगी मायके और ससुराल की थी।
दो जने का पेट मुश्किल से भरता था ,अब तो रामकली भी थी ,खर्च बढ़ गया था।
सरजू जमींदार के खेत में काम करता था।जो मिल जाए उसी से गुजारा होता था,जो काफी नहीं था।एक दिन सरजू ने निर्णय किया कि वह परदेस जाकर कुछ काम करेगा।
1911 का समय था,अंग्रेजों के खिलाफ जन जन में आक्रोश फैला था।हर छोटी बड़ी रियासतें अंग्रजों के खिलाफ एक जुट थी।
1857 के विरोध के बाद अंग्रेजों ने दमनकारी नीति अपनाई हुई थी।
सरजू ने बेहतर भविष्य के लिए सबसे विदा लिया ,और रामकली से कहा था ,तुम मेरा इंतजार करना ,जैसे ही कोई काम मिलेगा ,पैसा भेजूंगा।
सरजू चला गया,माधो को अंतिम बार उसने गले लगाया।
सरजू कलकत्ता आ गया था।वहीं उसे एक बंगाली पत्रिका अमृत बाजार छपती थी ,वहीं प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी लग गई।
इस अखबार के संपादक शिशिर कुमार घोष थे।
राष्ट्रवादियों के लिए यह अखबार विश्वसनीय अखबार था।
धीरे धीरे सरजू में भी राष्ट्रवाद की भावना हिचकोले लेने लगी।वह भी राष्ट्रवादियों में शामिल हो गया।
अभी आए महीना भी नहीं हुआ था,घर पर सिर्फ एक टेलीग्राम किया था , कि तनख्वाह मिलते ही भेज दूंगा ,मैं ठीक हूं।
बंगाल विभाजन से हिंदुओ में असंतोष था।
अंग्रजों को भनक लगी कि एक मकान में
कुछ क्रांतिकारी नेताओं और सरजू किसी बड़ी योजना के क्रियान्वयन को अंतिम रूप दे रहे थे।
चारों ओर से मकान को घेर लिया गया,और सबको गिरफ्तार कर लिया गया।
दमनकारी नीति के तहत मुकदमा चला कर सरजू को काला पानी की सजा मुकर्रर की गई। क्योंकि वह और भी गतिविधियों में शामिल था ,उसने अंग्रेज अफसर को मारने के लिए क्रांतिकारियों को हथियार भी पहुंचाया था।
वह अपना संदेश घर में दे भी नहीं पाया,उसे अंडमान के सेल्यूलर जेल में डाल दिया गया।
स्टारफिश के आकर का जेल।यहां सिर्फ मृत्यु के लिए क्रांतिकारियों को भेजा जाता था।
दूर दूर फैला अथाह जल ,जिसका कोई ओर छोर नहीं था।
लाल ईंटों से बना ये जेल,इसमें सात शाखाएं के बीच एक टावर था जिसपर एक बड़ा घंटा लगा था ,वहीं से कैदियों पर नजर रखी जाती थी।
पैरों में बेड़ियां डाल दी गईं थी ,और एक सेल में डाल दिया गया।सरजू ने देखा वहां एक खटिया थी ,और लोहे की थाली खाने को। कमरे की नाप करीब 4.5×2.7 मीटर थी।
वहां कोल्हू से सरसों और नारियल का तेल तीस पाउंड सबसे पेरवाया जाता था।
खाना आधा पेट देते थे।सरजू की हालत बहुत खराब हो गई । उष्ण कटिबंधीय जलवायु होने के कारण धूप बहुत होती थी,वे काम पूरा न होने पर नंगे बदन पर कोड़ों की बरसात करते।
असहनीय पीड़ा सहते सरजू ने एक दिन इस दर्द पीड़ा से हमेशा के अलविदा कह दिया।अंग्रजों ने पत्थर बांध कर ,और कैदी जानकर विद्रोह न करें समुद्र में फेंक दिया।
सरजू के मरने का कोई दस्तावेज नहीं मिला ,जिससे वो लापता की सूची में ही रहा।
और रामकली सिर्फ इंतजार ही करती रह गई, आता भी तो आता कैसे ,_???????
समाप्त

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