माँ की स्नेह मामता की मुरत,
पिता की मर्यादा बनूँ....
यादें ओझल सी बन गई,
क्या कहूँ,किससे कहूँ....
रो जाऊँ कभी मैं दिन-रात,
पुँछूं कब फिर भोर हुई....
दारुद बहती चल पड़ी अब,
आँखें नम से लोड़ हुई....
"रामायण" का पाठ सीखा था मैं उनसे,
कर्म के जल से स्नान किया....
अन्तरमुक्त हो गये कर्मों से,
ढ़ला उमंग की शान गयीं....
कवि:- विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

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