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जब बारिश की दो बूंदे मिट्टी पे छलकती है---
दिल झूम के गाता है धरती भी लचकती है,
जब बादल गरजते है मदमस्त बरसते हैं---
धरती से मिलने को हर पल तरसते हैं,
मधुर बूंदो की सरगम से धरा देखो बहकती है---
लालिमा मुख मंडल पर लिए दुल्हन सी दमकती है,
सोंधी सोंधी सी खुशबू से धरा महकने लगती है---
ओढ़ के वो धानी चुनरिया कुछ बहकने लगती है,
देखो सजी संवरी दुल्हन सी लग रही है---
थोड़ा बहक गई थी वो अब संभल रही है,
ओ मतवारे बादल जरा झूम के गाना---
साथ में कुछ तारों की बारात भी लाना,
अपनी सुहानी गर्जन से संगीत सुनाना---
थोड़ा बरसना थोड़ा दिल को बहलाना,
ओ बरखा रानी धीरे धीरे से आना---
सुशोभित धरती का मान बढ़ाना,
संगीता वर्मा

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