मां वो शब्द जिसमें सारा संसार समाहित है।
कहते हैं जब परमात्मा ममतामई हुए तो उन्होंने जगन्मांता का रूप ले लिया।
मां उसी जगत माता का अंश है।
बच्चों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढती,उनकी पसंद में ही अपनी पसंद ढूंढती मां।
मां के हाथों से बनी सूखी रोटी भी अमृत तुल्य होती है।
उसका वात्सल्य प्रेम खाने में परिलक्षित होता है,शुभ भावना के साथ वो अपने बच्चों के लिए खाना बनाती है ।
उसे पता है कि ,कौन सा खाना उपयुक्त है ,और कौन सा सेहत को बिगाड़ सकता है।वो घंटों गर्मी में खड़ी होकर ,अपने परिवार अपने बच्चों के लिए रोटियां सेंकती है,खाना बनाती है।पसीने को आंचल से पोंछती उफ्फ तक नहीं करती। नसीब वालों को ही मां के हाथों का खाना मयस्सर होता है।
एक ऐसी घटना मेरे दिमाग में कौंध रही है ,
सुरेश के पड़ोस में राहुल रहता था।किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता ,नकचढ़ा ,गुस्सैल,बात बात में कमी निकालने वाला ,खाने को लेकर हमेशा नुक्स निकालता ।उसे चाहिए था हर दिन रोज नया खाना और विशेषकर ,पिज्जा,बर्गर,और कॉन्टिनेंटल ।मां ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी ,वो नए नए व्यंजन नहीं बना पाती थी,लेकिन जो भी बनाती दिल से बनाती ,तो उसका स्वाद चार गुना बढ़ जाता।
सभी उसकी मां के हाथों में जादू है कहते ।
और ऑफिस में उसकी मां जो टिफिन में खाना देती उसे सबके सामने खाना तौहीन लगता।
अब उसने मां से साफ कह दिया कि ,आप मेरे लिए टिफिन मत बनाया करो ।मैं ऑफिस में मंगा लूंगा।
कुछ दिन बाद उसका ट्रांसफर दिल्ली हो गया,वहां ऑफिस में राहुल रोज जोमैटो से तरह तरह का खाना मंगाता।
कुछ ही महीने बीते होंगे ,राहुल के पेट में असहनीय दर्द उठा।डॉक्टर में अल्ट्रासाउंड की सलाह दी।उसका वजन भी बढ़ गया था।
अल्टासाउंड में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रोब्लम का पता चला,आंतों में अल्सर हो गया था,और डायबिटीज भी हो गया था उसे।उसे खाने में काफी हिदायत दी गई।
उधर , जब राहुल मां , के खाने की उपेक्षा कर रहा था ,तो शांति देवी (राहुल की मां) ने भी ठान लिया था कि वो राहुल के मन को भाने वाली हर रेसिपी सीखेगी ,इसके लिए उसने पड़ोस में रहने वाली रिया की मदद ली ,और इंटरनेट की मदद से पारंगत हो गई।
राहुल घर आ रहा है ,जैसे ये खबर मां को मिली ,मां का हृदय आनंद से भर गया।
मां ने उसके पसंद की सारी चीजें बना कर रखी थी,पूरे दिन दौड़ती भागती रही ,रिया को भी बुला लाई थी मदद को।
शाम को जब राहुल आया ,तो उसका चेहरा देख धक्क से रह गया शांति देवी का कलेजा।
ये क्या चेहरा पीला पड़ गया था।
राहुल मां को देखते ही बच्चे की तरह गले लग कर रोने लगा।शांति देवी को ये सब अप्रत्याशित लग रहा था,वो अवाक थी।
कुछ पूछती ,उससे पहले राहुल ने कहना शुरू किया, मां मैने आपका बहुत दिल दुखाया है न,उसकी सजा मुझे मिली।
शांति देवी ने कहा _क्या हुआ?
मां आप इतना अच्छा खाना बनाती है,मैने आपके खाने की कद्र नहीं की,हमेशा सिंथेटिक रंगों,तुरंत बने खाने जिसमें पौष्टिकता का अभाव रहता ,उस खाने के पीछे भागता रहा।
आज मुझे अहसास हुआ , कि तू कितने मनोयोग से मेरे लिए खाना बनाती पौष्टिकता,साफ सफाई ,और विशेष रूप से हमारे स्वास्थ्य के लिए ईश्वर को ध्यान करते खाना बनाती ,जो हमारी सेहत और मन पर असर करता ।
मां मुझे माफ कर दो,तेरे हाथ की खिचड़ी ही अब मुझे प्रिय है ।
इस तरह राहुल इस चकाचौंध की लजीज खाने की दुनिया जो मन को तो बहुत लुभाते है ,जीभ को भी संतुष्ट करते हैं ,लेकिन कुछ ही दिन । मां के हाथ का जादू कहीं नहीं ,कहीं नहीं।
छुट्टी भर शांति देवी ने राहुल का खूब ध्यान रखा ,उसकी सेहत सुधर गई ।अब वो मां को भी दिल्ली अपने साथ ले गया।
इसीलिए किसी ने क्या खूब लिखा है__
चखें हैं ,जाने कितने
जायके महंगे मगर।
ऐ मां,तेरी रोटी सारे
पकवानों पर भारी है।

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