माता शबरी रामायण की वो अप्रतिम पात्र है जिन्होंने भगवान की भक्ति से उस दुर्लभ गति को प्राप्त किया है,जो बड़े-बड़े योगियों को भी प्राप्त नही होती है।
माता शबरी आखिर कौन थी, और क्यों भगवान ने उन पर अपनी इतनी अहैतु की कृपा की आइए जानते है माता शवरी के जीवन से जुड़ी कुछ बातें।

एक बार हरिद्वार में महाकुंभ का पर्व पड़ा, बहुत से श्रद्धालु कुम्भ में स्नान करने गए।
एक राजा अपने परिवार और कुछ सैनिकों के साथ कुम्भ में पधारे। सभी ने उनका आदर सत्कार किया और राजा का शिविर लगाया गया।
 रात्रि के समय रानी ने अपने शिशिर की खिड़की से देखा कुछ साधु-संत बाहर सत्संग कर रहे है।तो रानी के न इन भी सत्संग की इक्षा जाग्रत हुई और उन्होंने राजा से सत्संग इन चलने का आग्रह किया।
लेकिन राजा ने कहा-"कि हम कोई साधारण इंसान नही है हम राजा रानी है इसलिए हमें अपने राजधर्म और कर्त्तव्य का ध्यान रखना चाहिए अतः हम लोग वहां नही जा सकते।

रानी के बार-बार आग्रह करने पर भी राजा ने रानी को नही जाने दिया। अब तो रानी के मन में स्वयं के लिए भी घृणा हो गयी कि मैं रानी हूँ इसलिए सत्संग में  नही जा सकती।
राजा तो शयन करने चले गए लेकिन रानी का मन वही सत्संग में लगा हुआ था।अतः उन्होंने शिविर से बाहर निकल कर संगम में जाकर डुबकी लगा ली।
डुबकी लगाने से पहले रानी ने भगवान से प्रार्थना की थी कि "हे प्रभु मैं रानी थी इसलिए आपके सत्संग में नही जा सकी तो मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि मुझे चाहे जिस योनि में जन्म दे देना लेकिन कभी रानी मत बनाना"।
 और कहते है कि"अन्ते गति सा मति"

के अनुसार वही रानी शबरी के रूप में अवतीर्ण हुई। शबर जाति में जन्मी इसलिए शबरी कहलाई,और कुछ लोग इन्हें भीलनी भी कहते है।
शबरी बचपन से ही ईस्वर के ध्यान इन लीन रहती थी। कभी बृक्षों से तो कभी पुष्पों से ईस्वर की चर्चा किया करती थी। 

शबरी का ऐसा भाव देख कर माता-पिता ने सोचा कि बेटी का विवाह कर देंगे तो घर गृहस्थी में रम जाएगी और ये बैराग्य की बातें भूल जाएगी।
तो उन्होंने शबरी के विवाह की तैयारी कर ली। बहुत से जंगली पशु-पक्षियों को पकड़ कर एक कोठरी में बंद कर दिया।
शबरी जी को जब पता चला कि मेरा विवाह हो रहा और ये बेचारे जीव सब भोजन के लिए आये है इनकी हत्या कर इनसे भोजन बनेगा तो उन्हें बहुत ग्लानि हुई।और उन्होंने सभी जीवों को कोठरी से आजाद कर दिया।
कोठरी से निकलते ही सभी जीव भागने लगे लेकिन जाते जाते शबरी को हृदय से आशीर्वाद देने लगे कि "शवरी तुमने हम सभी को मुक्त किया एक दिन ईस्वर तुम्हे इस संसार से मुक्त करेगा"।

अब शबरी ने घर छोड़ दिया, सन्तों के पास आश्रय लेने गयी तो एक तो स्त्री ऊपर से शुद्रा किसी ने भी अपने आश्रम में आश्रय नही दिया।

थक कर एक पेड़ के नीचे बैठी थी,तो ईश्वरीय प्रेरणा हुई कि तो क्या हुआ अगर सन्तों ने प्रवेश नही दिया। भक्ति नही तो कम से कम सेवा तो कर सकती हूँ ।और दृढ़ इच्छाशक्ति से वो पास के ही मतंग ऋषि के आश्रम में रात्रि में चुपके से जाकर सन्तों की सेवा करने लगी। 
जब सभी सन्त सो जाते तो उनकी कुटिया को साफ करना पूजा के लिए फूल पत्र एकत्र करना इत्यादि।

एक दिन एक बृह्मचारी के द्वारा पकड़ी गई तो आश्रम के स्वामी मतंग ऋषि के सामने लायी गयी।
पूछने पर शबरी रोने लगी बोली-"महाराज घर।में रहने की मनसा नही रही सन्तों ने आश्रम में प्रवेश नही दिया यही एक मार्ग समझ आया भक्ति का अब आप ही बताए मेंक्या करूँ"।

शबरी की बात सुनकर।मतंग ऋषि के नेत्रों से भक्ति की गंगा बह निकली और उन्होंने शवरी को बेटी मान कर आश्रम में रहने की अनुमति दे दी।

कहते है कि संसार में जो आता है उसे एक दिन जाना ही पड़ता। मतंग ऋषि का समय पूरा हुआ और  संसार से बिदा लेने  का समय आ गया तो शबरी रोने लगी कहने लगी-"महाराज अब मेरा क्या होगा मुझे भी अपनी मुक्ति का कोई मार्ग दिखाइए"।

मतंग ऋषि ने कहा "शबरी तुम श्रीराम की भक्ति करो एक दिन प्रभु तुम्हारी कुटी में जरूर आयेगें"।
अपने गुरु की आज्ञा से शबरी निरन्तर प्रभु की भक्ति में लीन रहने लगी और प्रतीक्षा करने लगी।

बहुत काल प्रतीक्षा करने के बाद एक दिन प्रभु श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण सहित उनकी कुटी में पधारे।

ताहि देइ गति राम उदारा।शबरी के आश्रम पग धारा।।

शबरी देखी राम गृह आये।मुनि के बचन समुझि जियँ भाये।।
जोरि पानी आगे भई  ठाड़ी।नयनन्ह नीर रोमावली बाढ़ी।।
केही बिधि अस्तुति करहु तुम्हारी।अधम जाति में जड़मति नारी।।
अधम ते अधम अधम अति नारी।तिन्ह मह मैं मतिमंद गवांरी।।
तब भगवान ने कहा "माता संसार के समस्त जीवों से मेरा सिर्फ एक ही नाता है और वो है भक्ति का"।

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।मानहुँ एक भगति कर नाता
।।
और भगवान श्रीराम ने शबरी को अपनी वह गति प्रदान की जहां से फिर संसार में लौटना नही होता है।और जो बड़े बड़े साधु संतों को भी दुर्लभ है।
धन्य है माता शबरी जिन्होंने भगवान की ऐसी भक्ति की संसार जिनका नाम लेने से ही भवसागर से तर जाता है।।

शीला द्विवेदी
(उरई जालौन उत्तर प्रदेश)