कातर आंँखों से चांँद सूरज
धरती को गौर से देख रहे,
लाखों सवाल है आंँखों में
मानो लोगों से पूछ रहे।।

भू, जंगल, उपवन बेच दिए
तूम नीर, हवा के व्यापारी ,
क्या शीतलता को बेचोगे
लगता है चांँद की है बारी ।।

सूरज भी आने में डरता
इस धरती के  चौबारों में,
मेरी किरणें कहीं कैद ना हो
मानव के स्वार्थ सलाखों में।।

धरती ने मन की कुछ बातें
 पाती में लिखकर भेजा है,
तूने मेरी सुंदरता को, क्या
तिल तिल कर मरते देखा है।।

कर प्रगति चांँद पर जा बैठा,
मानव कर्जदार प्रकृति का है
दाना ,पानी और सांसों पर भी
सर्वाधिकार उसी  का है।।

मैं पालनकर्ती मानव की,
इसलिए सभी दुख सहती हूंँ,
आहत होती हर रोज यहांँ
जीवन देकर भी मरती हूंँ।।

                     मीनू' सुधा'
        स्वरचित पूर्णतया मौलिक