ये जीवन है, ये चलता ही चला जाता है
कोई आके यहां, आँखों मे बस जाता है
यादों का क्या है,वो अक्सर टकराती हैं
कोई पल ऐसा, जो आके ठहर जाता है
कई बार आदमी जब अकेला होता है
साथ किसी का दर्दे-दवा बन जाता है
भुलाए से ना भूलते वे दिन-सुबह-शाम
पर वक्त के साथ हर निशां धुल जाता है
लगता था ना जी पायेंगे जिसके बिना हम
जीना अक्सर बिना उसके ही पड़ जाता है
स्वरचित व मौलिक
~ सूर्येन्दु मिश्र 'सूर्य'

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