आरजू जिसकी थी उम्र भर,
 वो तलाश छोड़ कर आया हूँ, 
सूखे हुए होठों पर आज,
 फिर प्यास छोड़ कर आया हूँ। 

चले अक्सर कुछ उम्मीदों का
 दामन थाम जिनके लिए,
जिन्दगी के लिए  आखिर वही 
सौगात छोड़ कर आया हूँ। 

मैने आज चुराई है निगाह 
अपने ही ख़्वाबों के खौफ से,
तेरे पैरों की जमीन के लिए , 
आसमान छोड़ कर आया हूँ। 

मुद्दतें गुजर जाती हैं उनका 
जिक्र भी लबों पे आये हुए, 
ना जाने किस गली में वो 
लम्हात छोड़ कर आया हूँ। 

तुझे जब गिला है मुझसे, 
तो क्या मुझे शिकवा न होगा, 
जिन्दगी तेरे बेवजह के ये 
सवालात छोड़ कर आया हूँ। 
🌹🌹रंजन लाल 🙏🙏