ये अवधी भाषा मे लिखी मेरी हास्य कविता है. 



भौजी हमरे खिसियाए गयी 
चार बात पाइ गयी 
भैया हमरे अइसन डॉटिन 
गुस्सा मा छनछनाय गयी 
हुआ इ  की भइआ हमरे पानी  मांगिन 
वै घुसी रही टीबी मा 
भैया हमरे कड़ुआ खाइन 
आग लागि गै जीभी मा 
वै उठिकै पनिओ ना दिहि 
वही मा रिसियाय गइन 
भौजी हमरे खिसियाए  गयी 
चार बात पाइ गयी 
भैया हमरे अइसन डॉटिन 
गुस्सा मा छनछनाय गयी

कहिन तुहसे हम पानी मांगिन 
तू ओका अनसुना कई दीहू 
वहपर से सुनी कै हमार लेक्चर  टीवी कै अवाज दुगना कै दीहू 
माथा पकड़ि कै आपन बइठिन 
गुस्सा मा तनतनाय गइन 
भौजी हमरे खिसियाए गयी 
चार बात पाइ गयी 
भैया हमरे अइसन डॉटिन गुस्सा मा छनछनाय गयी

इतना सुनतै भौजी हमरे भैया का  बोलै लागीं 
जौन भरे बैठी रही अपने भितरा  उ बतिया खोलै  लागीं 
कही बहरे  तू कमाय जा थ्या 
दिनभर घर मा मरी थै हम 
रत्ती भर फुर्सत नाय  पाइत 
यत्ना काम करी थै हम 
तनकी देर बैठि गयन हम 
तौ खुदै जाइक लै लेहे होत्या 
नाही तौ अपने छोटुआ से तनि कही देहे होत्या 
अरे रत्ती तौ फुर्सत मिली रही 
वही म बर बुताय  गइन 
अब बारी भउजी क रही तौ भैया हमरे सरमाई गइन 

अब कहत "लखनवी"पासा पलटि गय 
भैया हमरे खिसियाए गए 
वही खिसियाहट म भउजी से वै 
चार बात पाइ गए 
अबकी भउजी हमरे अइसन डॉटिन गुस्सा मा छनछनाय गए

कहत "लखनवी "घर घर कै इहै हाल बा 
सब जगह नाय बा लेकिन कुछ जगह  इहै बवाल बा 
लेकिन जौन बा चाहे केतनौ एक दूसरे म तकरार रहा थै 
मिया बीवी केतनौ लड़िहै तबौ उन्मा खूब प्यार रहा थै

लेकिन यत्ना गुज़ारिश बा की केतनौ आपस म गुस्सा बा तकरार बा 
आपन साथ कबहुँ ना छोड़्या एक दूसरे क खूब सम्मान प्यार द्या 
आपका मुकेश "लखनवी "