पहाड़ों से निकलती नदी ,अल्हड़,बलखाती,जीवन के प्रति बेपरवाह।
रास्ते में आती हर चीज को बहाती ,उधम मचाती ,खुद में समेट लेती है।
वैसे ही हमारा बचपन उन्मुक्त,चिंताओं से परे,पवित्र।
मैदानों तक आते आते नदियां ,कई नदियों से मिलती ,खेत खलिहानों को सींचती आगे की ओर बढ़ती जाती है,यह जीवन की निरंतरता का संदेश देती है,अर्थात सुख और दुख ,उतार चढाव जीवन के अंग हैं,उनका सामना करते आगे बढ़ना।
प्रौढ़अवस्था में मनुष्य की दशा ऐसी ही होती है।
अंत में नदियां अपने साथ कई नदियों को लेकर सागर में मिल जाती है,जहां जीवन की रफ्तार धीमी हो जाती है ।
तात्पर्य ये है कि जीवन की सभी अवस्थाओं,से गुजरते हुए उस परब्रह्म यानि समुद्र में मिल जाना है सत्य है।

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