ज़माने के सांचे में
अबतक ढ़ले नही हम
चाहते हैं जैसा लोग
वैसे बनें नही हम!
इसीलिए नही है
कुछ ज्यादा दोस्त हमारे
लगता है दोस्ती के
लिए बनें नही हम!
बरसों अकेले रह सकते हैं
जो ना मिले मन का कोई
पर बेमन से कोई साथ रहे
रहते वहां नही हम!
आसान नही हैं झेलना
हमको ज्यादा दिन
इसीलिए मिलते किसी से
अब ज्यादा नही हम!
जमाने के सांचे में
अबतक ढ़ले नही हम !!
मौलिक एवं स्वरचित
सतीश निर्दोष
रेवाड़ी (हरियाणा )

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