अप्रैल का दिन था,दोपहर के 12 बजे नीलम अपने घर
के बाहर लॉन में झाड़ू लगा रही थी । आज मंगलवार का
व्रत था ,तो सोची सारे काम खत्म कर नहाऊंगी......बच्चे स्कूल में थे और पति ऑफिस में............।
तभी अचानक एक औरत आ के लॉन में लगी कुर्सी पर 
बैठ गयी नीलम चोंक गयी और पूछी जी आप कौन और
किससे मिलना है आपको........., जी मैं नई आयी हूँ इस मुहल्ले में आपको बाहर देखी तो सोची आपसे थोड़ी जान
पहचान कर लूं........।
          नीलम ने एक नजर उसपे डाली इतनी लम्बी है,बाल भी इतने लंबे ,बड़ी सी बिंदी,गहने और साड़ी कितने
अच्छे हैं ।लगता है किसी अच्छे परिवार की है।मन ही मन
सोच रही थी। .........आप पानी लेंगी नीलम ने कहा??
जी नहीं मैं आपको लेने आयी हूँ......औरत ने मुस्कुराते
हुए कहा .......।
क्या??????नीलम संदेह भरी नज़रों से उसे देखने लगी।
औरत बोली चलिए न  मेरा घर पास में ही है........।
    नीलम बोली जी नहीं मैं अभी नहीं जा सकती आज मेरा व्रत है मंगलवार का में पूजा भी नहीं की हूँ.......।
परन्तु उस औरत ने ज़िद पकड़ ली ...........नीलम कुछ 
समझ नहीं पा रही थी ऐसा क्यों कर रही है।
     नीलम थोड़ी डर गई और अंदर जाने के लिए मुड़ी

                   उस औरत ने झट से  नीलम का हाथ पकड़
लिया नीलम के पूरे शरीर में बिजली का झटका लग गया वो कुछ समझ नहीं पा रही थी.....औरत नीलम को लेकर तेज कदमों से चलने  लगी .............…
     रोड पे कोई नहीं था जिससे नीलम मदद माँगती वो बस एक ही बात बोले जा रही थी छोर दो मुझे मैं नहीं जाऊँगी लेकिन वो औरत उसे खिंचते हुए ले जा रही थी।
..…............   तभी नीलम की पड़ोसी संतोसी जो अपने घर के बाहर
गमले में पानी डाल रही थी।
...........वो नीलम को देख चोंक गयी
और नीलम के पीछे चल दी ..........अरे कहाँ जा रही हो.....संतोसी नीलम से पूछी नीलम कुछ बोलने की हालत में 
नहीं थी । उसने संतोसी का हाथ पकड़ बोली चलो मेरे साथ.......।औरत ने पीछे मुड़कर देखा तो संतोसी बोली कौन है आप और इसे कहाँ लेकर जा रहे हैं .....मैं अपने घर ले जा रही हूँ। आप भी चलिये.........ओर मुस्कुरा दी
संतोसी को कुछ गड़बड़ लगा । नीलम की हालत ठीक नहीं लगी उसे । तो वो भी साथ चल दी ...............।
अब कितनी दूर है आपका घर संतोसी ने कहा तो औरत
बोली इस मुहल्ले के अंतिम में मेरा ही घर है।
          एक दो मंजिला मकान के आगे वो औरत रुक गयी
मेन गेट खोलते हुए बोली आइये अंदर........संतोसी को बहुत आश्चर्य हुआ इतना सुंदर मकान है। अंदर एक हॉल
था उसमें एक पुरानी सी खाट लगी थी ।औरत ने नीलम 
का हाथ छोड़ा और बोली बैठये........।नीलम को लगा 
नींद से जगी,संतोसी को बोली ये हम कहाँ आ गए।
............... संतोसी चुप रहने का इशारा की ।
उस औरत से पूछी आप यहाँ अकेली रहती हैं।तो औरत थोड़ी मायूस होके बोली  हाँ 20 साल से नीलम आश्चर्य से देखने लगी आपके पति और बच्चे???????
       वो मुझे छोड़कर चले गए.........औरत बोली.....
संतोसी बोली ठीक है अब हम जाते हैं नीलम भी बोली हाँ
हम अब जा रहे हैं...........।
           नहीं .......आप कुछ खाये बिना कैसे जाएँगी औरत बोली .........तभी संतोसी की नज़र कोने में रखी एक मिट्टी के चूल्हे पे पड़ी वहां कुछ सुखी लकड़ी पड़ी थी
और एक पतीले में अंकुरित चना रखा था । वो औरत कोने की तरफ मुड़ी...... तो नीलम बोली अरे............मेरा व्रत है मैं कैसे खाऊँगी संतोसी भी बोली हाँ नहीं खा सकते और दोनों खड़ी हो गयी । औरत ने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोली कैसे नहीं खाओगी............खाना पड़ेगा ।
     नीलम घबरा गई तो  संतोसी ने इशारा किया चुप रहो।
संतोसी बंगाली थी वो थोड़ा समझ गयी कुछ तो गलत है।
लेकिन अब निकले कैसे ये सोच ने लगी।
         वो औरत चूल्हा जलाने की कोशिश में लगी थी।
तभी संतोसी बोली हमें प्यास लगी है पानी पिला दीजिए।
वो औरत बोली अभी लाती हूँ कह के मुस्कुराई ,और अंदर के कमरे की ओर चली गयी ।
              संतोसी नीलम का हाथ पकड़ के बोली चलो जल्दी भागो यहां से दोनों दौड़ते हुए जब मेन रोड पे आयी
तब थोड़ा रुकी तभी दो आदमी वहां से गुजर रहा था उसने दोनों को डरा हुआ देख पूछा कोई परेशानी है........।
संतोसी ने संक्षेप में सारी बात बताई तो उस आदमी ने हैरानी जताई और बोला....................।
......... ..        .वहां तो अब कोई नहीं रहता ,करीब 20-22 साल से वो मकान खाली है । लोग कहते हैं वहां साया है,आप लोग को भगवान ही बचाये.........।
      नीलम और संतोसी का पूरा शरीर ठंडा हो गया।
किसी तरह दोनों घर पहुंची तब तक 4 बज गया था।
       थोड़ी देर में नीलम के पति औऱ बच्चे भी आ गए।
संतोसी अब तक नीलम के घर पे ही थी।
दोनों ने सारी घटना सबको बताई।
   .............नीलम के पति बोले आज तो बजरंगबली ही 
बचाये आप लोग को.......।।।।।।।।।।।।
                               ऋचा कर्ण✍✍