गंगा के अनेकों अनेक नाम है,।
गंगा का उल्लेख पुराणों में मिलता है ,और इनके जन्म की भी ढेरों कहानियां मिलती हैं।
जैसे_
इन्हे विष्णुपदी भी कहा जाता है ,इनका जन्म विष्णु जी के पैर के नाखून से भी बताया जाता है।
इन्हे स्वर्ग की अप्सरा_जहां शाप से पृथ्वी पर अवतरित हो शांतनु से विवाह और देवव्रत के जन्म और पुनः देवलोक प्रस्थान के बारे में उल्लेख है।

इन्हें हिमवान की पुत्री और पार्वती की बहन के रूप में भी जाना जाता है।

धरती पर इनका अवतरण भागीरथ के अथक  प्रयास का परिणाम है।इसलिए इन्हें भागीरथी भी कहते हैं।
राजा सगर के 60000 पुत्रों के उद्धार के लिए भागीरथ ने कठिन तपस्या की ,जिससे प्रसन्न हो  गंगा  स्वर्ग से पृथ्वी पर आईं,लेकिन अनियंत्रित वेग को नियंत्रण में करना मुश्किल था इसलिए  शिव ने इन्हें अपनी जटाओं में स्थान दिया। 

हिमालय से उतरती गंगा,भागीरथ के पीछे पीछे होती ऋषि जाहनू के ऋषिकेश स्थित आश्रम और यज्ञशाला को उखाड़ प्रचंड वेग से निकली ,तब उन्हें ऋषि के कोप का अधिकारी बनना पड़ा ,ऋषि ने क्रोधित हो ,गंगा का सारा जल पी लिया ।

देवलोक में हाहाकार मच गया,सभी ने ऋषि की वंदना की ,भागीरथ ने ऋषि के आगे क्षमा याचना की। तब ऋषि ने गंगा को अपने कान से मुक्त किया ।
तब से गंगा जाह्नवी कहलाई।

इन्हें त्रिपथगा भी कहते हैं,कहा जाता है जब शिवजी ने उन्हें अपनी तीन लटों से मुक्त किया ,तब एक धारा स्वर्ग की ओर,एक भागीरथ के पीछे और एक धारा पाताल में चली गई।
बंगाल में ये मेघना के नाम से भी जानी जाती हैं।बाद में ये बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं।और ये स्थान गंगा सागर बन जाता है।

पवित्रता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है , कि हमारे धर्मग्रंथ कहते हैं_
सारे तीरथ बार बार।
गंगासागर एक बार।।

मां की गोद में मोक्ष की कामना लिए ,मनुष्य डुबकी लगाते हैं।कहते है पापनाशिनी मां सबको अपनी गोद में स्थान देती है ।जहां गंगा जंगल,पहाड़,मैदान से गुजरती हमें जीवन देती है ।उस मां के लिए भी हमारा कर्तव्य होता है कि हम उसे साफ रखें।
अंधाधुंध बांधों का निर्माण,गंगा के किनारे अवैध निर्माण,पेड़ों की कटाई ।इसका खामियाजा लोग भुगत भी रहे लेकिन अभी भी संभल नहीं रहे।कुछ वर्षों से कितनी जिंदगियां इनके क्रोध ने लील ली।