मुझे कितनी मुहब्बत है तुझसे,
ये  मैं अक्सर कहती रहती हूँ तुझसे,

कभी अपना  कोई गीत, कभी कोई ग़ज़ल,
  कभी कोई दिलफ़रेब नज़्म भी,
     कर देती हूँ हवाले तेरी मुहब्बत के,

पर फ़िर भी तो दिल नही भरता मेरा,
 तब इकट्ठा  करती हूँ कुछ आला शायरों के कलाम,
  जिसमें ज़िक्र हो मुहब्बत का

कॉपी पेस्ट कर लेती हूं अक्सर,
 मुहब्बत के कुछ बचकाने  किस्से 

औऱ सब भेज देती हूँ तुझे,
   सिर्फ़ ये बताने के लिए,
   कि कितनी मुहब्बत है मुझे तुझसे,

चुरा लाती हूँ कभी कही से,
  कुछ टिप्स,
   मुहब्बत के शजर को हरा भरा रखने की,
    गाहे बगाहे तुझे सुनाती भी रहती हूँ,

    हर वो कोशिश ,
   जो तुमसे मेरा रिश्ता मजबूत करे,
       मुझे करने से कब गुरेज़ होता  है,

   पर मेरी हर कोशिश पर भारी है,
     तेरा सिर्फ़ ये कहना,
       कि तेरी आँखों के दो जुगनू,
        मुझे बहुत पसंद हैं 

कांची सिंघल "ओस"