उछलती कूदती, मदमस्त सी ,लहराती चलती थी वो ,कभी नादान, कभी शोख ,कभी चंचल चितचोर सी लगती थी वो ।
आ जाये जो भी पनाह में उसकी कहते न थकता था पागल सी हुई है नदी शायद ऐसा लगता था।
कितना कुछ मिलता - जुलता सा था तेरा और मेरा सफर, तेरी मंजिल सागर था और मैं बेमंज़िल मुसाफिर ॥
साथ तेरे जो आता था बस तुझे में ही मिल जाता था और इक मैं हूँ जो हाथ गर किसी का थाम लूं तो मरकर ही छूट पाता था!!
नदी और जिंदगी है एक पक्की सहेली सी, लगती है अक्सर एक पहेली सी!!!
कुछ हद तक सुलझी तो कुछ अनसुलझी सी!!
जितना ज्यादा जानना चाहोगे इसकी गहराइयों को तुम ,उतना ही उलझता सा पाओगे खुद को तुम !!
अचानक से आई विपदा कर जाती है पागल सा नदी को, वहीं अकस्मात प्राप्त हुआ धन मदमस्त कर जाता है। जिंदगी को !!
चलते जाना ,बस चलते ही जाना, यही तो सिखाती है इक नदी!!!
राह में आये चाहे कितनी भी बाधाएं, नहीं घबराना डट कर करते जाना हर एक मुसीबत का सामना!!
तोड़ कर हर बंधन चट्टानों से टकराती है।
नदी हो या जिंदगी हमें हर हाल में जीना ही तो सीखाती है!!
भूलकर अतीत के कड़वे अनुभव,भविष्य का मुँह मत ताक तू , जी ले जी भर के अपने आज को तू , देख तो ज़रा फिसल रही है हाथ से रेत की तरह जिंदगी ,जैसे गिरती है ऊंचे-2 पहाड़ों से नदी, फिर चूमकर धरती को अपनी राह में आने वाले हर कंटक को बाहों में भर लेती है, ऐसी ही तो "होती है ज़िन्दगी " !!!!
थोड़ा सा पागलपन भी है ज़रूरी इस नीरस होती जिंदगी में इठलाती, इतराती यही तो सिखला जाती है एक पागल हुई नदी!!
एकता श्रीवास्तव

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