यह कविता उस दलित किसान परिवार के लिए है, जिनको पुलिस द्वारा अमानवीय यातनाएं झेलनी पड़ी और जनता हमेशा की तरह मूकदर्शक बनी रही| सत्ता की मद में अंधा कानून......
शर्मसार है फिर से भारत,
छुपे हुए गद्दारों से|
मानवता भी चीखी है,
खेत ओर खलिहानों से||
क्यों दलित का दर्द कभी,
कानून नहीं समझता है||
क्यों अमीर की चाल कभी,
कानून नहीं समझता है||
कैसे समझेगा कानून दलित को,
वह तो भोला-भाला है|
कैसे समझेगा कानून अमीर को,
वह तो उसी का पाला है||
शर्म बेच दी,दया बेच दी|
बेच दिया उस खादी को|
बरस के डण्डे चला रहे है,
बेच दिया उस वर्दी को||
इंसान नहीं हैवान हो तुम,
अन्नदाता पर अन्याय किया!
बेचारे दलित परिवार के साथ,
क्या सच में तुमने न्याय किया?
सत्ता के लालच में पिल्लै,
जोर अपना दिखवा रहे|
गरीब पर लाठी बरसा के,
काम अपना निकलवा रहे||
देख हालत जरा उन मासूम की,
जिनके मात-पिता का इंतकाम किया|
छोटे-छोटे बच्चों की भी,
मौत का इंतजाम किया||
कर्ज लेकर बोई फसल पर,
जेसीबी से वार किया|
दलित कि महिला के कपड़ों को,
लाठी से तार-तार किया||
वो तो कर्ज चुकाने को,
करते थे कुछ मजदूरी|
जान लगानी पड़ी दाँव पे,
हालत कर दी इतनी बुरी||
बिलख रहे उन बच्चों की,
किसी ने भी ना सुनाई की|
बेरहमी की हदें पार कर,
मिलकर सबने पिटाई की||
देख तमाशा लाठी वालों का,
क्यों कैमरा निकाल रहें!
जरा सामना कर लो जाकर,
क्यों निर्दोष को मार रहें||
कब तक दुनिया वालों को,
ऐसी घटना दिख लाओगे|
पकड़ लो जाकर लाठी उनकी,
अच्छा सबक सिख लाओगे||
जीवन जिनसे चलता अपना,
उस कृषक को तुम ना मरने दो|
साथ निभाकर अड़े रहे तुम,
वर्दी को इतना तुम ना उड़ने दो||
सस्पेंड किया कलेक्टर को,
आगाज किया प्रशासन को|
पीछे से जो खेल रहा,
बचा लिया उस दु:शासन को||
जब तक सरकार नहीं कसेगी,
घूसखोरी के खिलाफ लगाम|
तब तक यूँ ही मरते रहेंगे,
घूँट-घूँट जहर पीकर किसान||
रंजना सोनी

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