कैसा ये मंजर है, कैसी ये उदासी है 
क्यों दिल को नहीं चैन कहीं, 
क्यों लब पर ख़ामोशी है
कुछ बात है जो कही नहीं जा रही, 
सामने गहरा समुन्दर है मगर, 
 फिर भी रूह प्यासी है

कुछ तो बात है जो पर्दानशी है 
मगर गौर से देखो कुछ भी दिखता नहीं है 
ऐसा लगता है किसी अपने की तलाशी है 
कैसा ये मंजर है कैसी ये उदासी है
क्यों दिल को नहीं चैन कहीं, 
क्यों लब पर ख़ामोशी है 

क्यों इस तरह जी रहे हो तुम 
क्यों गम का कड़वा घूँट पी रहे हो तुम 
मन मे खलल है या की बदहवासी है 
कैसा ये मंजर है कैसी ये उदासी है
क्यों दिल को नहीं चैन कहीं, 
क्यों लब पर ख़ामोशी है 

इस समां को जरा गौर से देखो 
हो सके तो कहीं और से देखो 
अमावस की रात है ये या की पूर्णमासी है 
कैसा ये मंजर है कैसी ये उदासी है
क्यों दिल को नहीं है चैन कहीं 
क्यों लब पर ख़ामोशी है
आपका मुकेश"लखनवी"