निराश
पेड़ की छांव में बैठे बुजुर्ग दम्पति-
जीवन के अंतिम मोड़ पर
धुंधली नजरों से देख रहे अपने नियति-

पेड़ के उस तरफ
दूर क्षितिज को आलिंगन करता था एक रास्ते का मोड़-
जिसकी आखिरी हद तक तो दिखा था
अपना वह परिंदा
जो सपनों का बहाना कर उन्हें यूं गया था छोड़-

दोनों की आंखों में
छलकते आंसू सिर्फ़ एक दूसरे को दे रहे थे
खोखली सांत्वना - 
किसको दोष दें अब
कल उन्होंने ने ही तो तैयार की थी 
दुनिया में उड़ान भरने प्रस्तावना-
 
पेड़ पर 
बैठी एक चिड़िया अंडों से निकले
अपने चूज़ों को खिला रही थी-
फिर आहिस्ता आहिस्ता 
उन्हें उड़ना सिखा रही थी-

यह देख कर
अचानक बुजुर्ग दंपत्ति की डबडबाई आंखो को देख कर चिड़िया चहचहाई-
और बोली 
यह तो प्रकृति का नियम
मैं जानती हूं कि कल यह भी ऊचाईयों पर उड़ जायेंगे
और एक नया घोंसाला बनायेंगे, 
और रह जायेगी हमारी भी आपकी तरह तन्हाई - -

संभावना है
आप के बेटे/बेटियाँ तो 
शायद एक बार लौट आयें
या आपको अपने साथ ले जायेंगे--
अभागे तो हम हैं
हमारे बच्चे तो एक बार उड़े तो 
आसमान में उड़ कर न जाने कहां घोंसला बनायेंगे- 

फिर भी हम 
खुद उन्हें उड़ना सिखाते हैं-
शायद 
यह हमारा कर्तव्य है जो हम निभाते हैं-
                              राजीव रावत