तूने जिस्म को चाहा रूह से बेखबर होकर
कभी चाहा ही नहीं मुझे मेरा होकर
तू पहचान ना सका ईश्क की धारा को समंदर होकर
मैं प्यासी थी ईश्क के एक प्याले की
भूखी थी तेरे हाथों से प्यार भरे निवाले की
तू प्यासा था जिस्म का क्यों रो रहा है अब मुझे खोकर
भूखा था हुस्न का तुझे क्या मिला मिली ठोकर ही ठोकर
वो जिस्म भी बेजान हो गया रूह से मुख्तलिफ होकर
काश कभी तो ईश्क कामिल होता
काश तू मुझमें शामिल होता मेरा होकर
काश तू मुझमें शामिल होता मेरा होकर।।
कोई जिस्म को चाहे
कोई चाहे दीदार ए हुस्न को
मुक्कमल ईश्क उसे मिला
जिसने चाहा रूह से रूह को
जिसने चाहा रूह से रूह को।।
मुख्तलिफ-जुदा
कामिल-पुरा
मुक्कमल -सम्पूर्ण
पिंटू कुमावत'श्याम दिवाना'🙏🙏 💐💐

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