जब तुम देख रहे होते हो
पेड़ की एक पत्ती
मुझे उसमें दिखती है 
विशाल वृक्ष की विशाल शाखायें
इसलिए नहीं तोड़ता उन्हें

जब तुम एक नाज़ुक कली देख रहे होते हो
मैं उसमें देखता हूँ एक खूबसूरत फूल
इसलिए नहीं मसलता उन्हें

जब तुम देख रहे होते हो एक नन्हा कोकून
मुझे दिखती है खुद में सिमटी एक तितली
जो अगले ही पल 
पसारेगी अपने खूबसूरत इंद्रधनुषी पंख

जब आप देखते हैं एक असहाय वृद्ध
तब मैं देख रहा होता हूँ
ताउम्र कंधों पर जिम्मेदारियों के बोझ से
झुकी उसकी कमर
मैं उसे दया नहीं सम्मान की नजरों से देखता हूँ

जब तुम देख रहे होते हो 
वीरानी में पड़ी रेल की सुनी पटरियों को
तब मैं सुन रहा होता हूँ
रेलगाड़ी के पहियों की धुन
मुझे छू के गुजरती हवा की सरगम

उस पल मैं देख रहा होता हूँ
खिड़की से पीछे छूटते पेड़ और पहाड़
आंखों से ही छू रहा होता हूँ 
नदियों की धार
और महसूस कर रहा होता हूँ
रेलगाड़ियों में बैठे यात्रियों की धड़कनें
उनके घर पहुचने की बेताबी


बहुत फर्क है तुम्हारे और मेरे देखने में...
           ---दीपक कुमार