प्रिति "साँरी न..देव..अब से नहीं सोचुँगी"
प्रिति का घर आ जाता है ,मुस्कुराते हुए बाय बोलकर वह अपने घर चली जाती है।
घर जाकर प्रिति को बहुत थकान महसूस हो रही थी।
उसे चक्कर भी आ रहे थे और उदास भी होती है यह सोचकर की कल से स्कूल भी नहीं जाना है।
प्रिति रसोई घर मे खाना बनाते हुए अपनी सासु माँ से बोलती है, "मै अपने मायके जाना चाहती हूँ ..काफी दिनो से माँ की तबियत भी ठीक नही है बहुत दिनो से मिली भी नही हूँ।"
सासु माँ - "स्कूल नहीं जाना का ?? बेमतलब की छुट्टी
करोगी तो पैसा तो तनख्वाह से कट जाएगा।"
प्रिति ."स्कूल मे जाड़े की छुट्टी हो गई है, अवि की भी।"
सासु माँ "इ तो चलो बहुते अच्छा हुआ अवि की छुट्टी हो गई वरना सुबह उठाना होता ओका।
ठीक है छुट्टी हो गई है तो चल जाओ" ..
'कब जाओगी??"
प्रिति "कल"
सासु माँ "तुम अपना ही सिर्फ़ कपड़ा बक्सवा मे डालना ,उ का है की अवि को हम अपने पास ही रखेंगे। ओका बैगेर हमरा मन नहीं लगत है
प्रिति कुछ नही बोलती है
प्रिति घर के सारे काम करके अपने भाई को फोन करके बताती है , कल वो घर आ रही है।
प्रिति का भाई उससे पूछता है तुम आ जाओगी अपने से की मै लेने आऊँ।
प्रिति बोलती है ,नहीं, मै खुद आ जाऊँगी।
प्रिति रात को सबको खाना खिलाने के बाद रात को 11:00 बजे अपने कपड़े बक्से में डालती हैं जाने की तैयारी करती जाती है साथ ही साथ निगाह भर कर सोए हुए अवि को देखती जाती है। आँख से आँसू बहते जाते है ,
सोए हुए अवि को बार बार चूमती जाती है। सोचती
है स्कूल जाना तो मजबूरी है मगर अपने मायके मे भी अपने बच्चे को ले जाने की इजाजत नहीं है मुझे।
वो रोते रोते अपने कलेजे से अपने बच्चे को चिपकाकर लेट जाती है ,लेटे लेटे कब आँख लग जाती है पता ही नही चलता है।
सुबह अवि के उठने से पहले , टैक्सी करके प्रिति अपने मायके चली जाती है।
वहाँ अपनी काकी माँ ,भाभी से, माँ से जाकर मिलती है। भाई घर पर नहीं था वो अपने आँफिस जा चुका था। प्रिति की भाभी उसे चाय नाश्ता करवाकर अपने
काम पर हास्पिटल चली जाती है। जाते वक्त बोलकर जाती है दोपहर का खाना बना हुआ ,खा लिजियेगा। आप तो जानते ही है मुझे आने मे देर होती है।
प्रिति - "हम्म" ..कहती है
कमरे मे जाकर अपनी माँ से मिलती है। उनके पैर छूती है ..भाई के लिए पूछती है।
माँ कहती है "मनू काम के सिलसिले मे दो तीन दिन के लिए बाहर गया है।"
माँ "कैसन हो बिटिया इते दिनो बाद बूढी माँ की याद आई।"
प्रिति "याद तो हर दिन आई ..का करते माँ कैसन आते हमका तो तुम ब्याह करके कबै पराई कर दी हो।
हमरा बस चलता न माई ,हम कबहूँ नहीं जाय उ घर मा"
माँ "का हुवा बिटिया कोनो बात है का , ऐसन काहे बोल रही हो..और इता कमजोरो काहे लग रही हो..उहाँ सब कुछ ठीक ठाक है न ,ठीक से खाती पीती नहीं हो का।
प्रिति "सब कछु ठीक है हमरी चिंता करके अपना कलेजा न जलाओ..थोड़ा थक गए है आराम करेंगे तो ठीक हो जाएंँगे।"
माँ "कछु खईले की ना ही"
प्रिति "हाँ माँ खाई लिये है"
प्रिति अपनी माँ के बगल मे लेट जाती है।
लेकिन लेटते ही उसका जी मचलने लगता है..ऊबकाई आने लगती है।
माथे पर पसीने आने लगता है।
माँ "का हुआ बिटिया कछु उल्टा पुल्टा खाई ली का"
प्रिति "नहीं माँ कछु नाही हुवा है तुम आराम करो।"
प्रिति अपनी सहेली डाक्टर नीलीमा को फोन करती है।
नीलिमा कैसी है तू??
प्रिति अच्छी नही हूँ तभी तो तुझसे मिलना चाहती हूँ
नीलीमा क्या हुआ मेरी जान को
प्रिति तेरे पास समय है तो आ जाऊँ तेरे क्लीनिक
नीलिमा आजा ,अभी आजा मै फ्री हूँ , अभी कोई पेशेंट नही है
प्रिति ठीक है आती हूँ ।
प्रिति उठकर मुहँ धो कर तैयार होती है।
माँ से अपनी कहती है माँ थोड़े देर बाजार जा रही हूँ।
एक ..दो घंटे मे आती हूँ।
माँ "ठीक है बिटिया कोनो हड़बड़ नही है ..आराम से आ जाना।
किते दिनो बाद आई हो घूमो फिरो खुश रहो।"
प्रिति नीलिमा के पास जाती है अपना चेकअप करवाने ..
नीलिमा उसे बताती है वो दो महीने से प्रेग्नेंट है।
प्रिति बोलती है "मुझे कैसे पता नहीं चला"
नीलिमा बताती है बहुत महिलाओं के केस मे ऐसा होता है पीरियड्स एंड प्रेग्नेंसी एक साथ होता है।
महिलाओं को पता नही चलता है।
प्रिति नीलिमा से कहती है "मै ये बच्चा नहीं चाहती हूँ ,मै अबॉर्शन करवाना चाहती हूँ।"
नीलिमा "आर यू श्योर"
प्रिति हम्म
नीलिमा जीजू को बताया..
प्रिति "उसकी जरूरत नही समझती मै"
तू तो जानती है न मेरी समस्या क्या है ..तभी तो तेरे पास आई हूँ।
किसी और डाक्टर के पास जाती तो वो उनकी साईन माँगती। लेकिन तू कैसे मैनेज करेगी ..ये तू समझ
नीलिमा "हम्म"
प्रिति "बस तू मुझे ये बता कब आऊँ मै अबाँर्शन
के लिए , तू जब बोलेगी मै उसी समय उपस्थित हो जाऊँगी।"
नीलिमा "यार जब तूने फैसला ले ही लिया है तो मै क्या कहूँ आ जाना 11:00 बजे।
ज्यादा देर करना भी ठीक नही होगा" ..
दूसरे दिन घर मे किसी को भी बिना बताए वो हास्पिटल जाकर अपना अबाँर्शन करवा लेती है।
घर आकर चुपचाप अपना सो जाती है।
प्रिति की माँ प्रिति से पूछती है "बिना खईले काहे सुत रही हो , तनी कछु खा लो।"
प्रिति "नहीं माँ हमर तबियत ठीक नहीं लगत है .तुमार पासे जै सिस्टर है ओका बोलो.हमका एक गिलास गर्म दूध ला देगी रसोई घर से।"
सिस्टर दूध लाकर देती है, प्रिति दूध पीकर सो जाती है।
दो चार दिन ऐसे ही निकल जाते है।प्रिति को भी पहले से बेहतर लगने लग जाता है।
प्रिति अपने भाई से मिलती है वो उसका हाल चाल पूछता है। दोनो भाई बहन एकसाथ खाना खाते है।
थोड़ा देरी बतियाते है.।भाई उसका आराम करने कमरे मे चला जाता है।
प्रिति अपनी माँ के पास चली जाती है।
प्रिति की माँ उससे कहती है "आज हमरा तबियत ठीक नहीं लगत है"
प्रिति "काहे का होईल माँ, डाक्टर के बुलावे का"
माँ, "नहीं बिटिया का बुलाओगी ,कभी कभी ऐसन लगने लग जाता है ..फिर ठीक हो जावत है .।
फिर वो अवि के बारे मे पूछने लग जाती है।
कैसा है कतना दिन हो गवल है ओका देखे नही.।
कता बड़ा हो गवा बबुवा
तुमरी सास कभी नहीं भेजत है नहिरे मे ,ना जाने का है ओका मन मा..."
इधर देव प्रिति का हर रात इंतजार करता , प्रिति क्यो नहीं आती है आनलाइन..।उस दिन हम उसपर चिल्ला दिए थे कही हमसे नाराज तो नहीं है न ,..
यह सोचकर बहुत सारे ख्याल उसके मन मे आ रहे थे।
कभी सोचता शालू को बोलू क्या ..
फिर सोचता नहीं .। वो तो उल्टा मुझे ही डाँटेगी।..ऐसे
सोचते हुए एक सप्ताह निकल जाता है।
एक दिन देर रात देव, प्रीति को व्हाट्सएप पर ऑनलाइन देखता है।
देव - hii..
इतने दिनो बाद और इतनी देर रात को
प्रिति हाँ आज पूरी रात जागेगे
देव क्यो??
प्रिति मेरी माँ (नानी) का देहांँत हो गया है।
क्रमशः.......

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