निरंतर बह रही जीवन धारा
सूखी, रेतीली,पथरीली राहें
प्रवाह रोकती सरिता का
उष्णता का चढ़ता पारा है!!!
घोर अंधेरा छाया जैसे
प्रधिप्त उजाला गुम हुआ,
डगमग डोल रही नैया
उचित अनुचित का कौन खिवैया !!!
हर प्राणी संस्कारी है
परिस्थितियों से हारे सब,
कोई किसे, क्यों दाग लगाए
विषमताओं के मारे सब !!!
अक्षुढ़, भंगुर जीवन में
असमंजस ने ही घेरा है,
करें ना करें का प्रति द्वंद
माया का प्रतिपल फेरा है !!!!
विषमताओं में सामंजस्य बिठा
चुनौतियों को स्वीकार करो,
नित नए आयामों को पाकर
असमंजस का प्रतिकार करो !!!!
स्वरचित, मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित,,,
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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