लिखना चाहती थी प्रेम पर चंद पक्तियां कागज और कलम लिए बैठी थी,
पर क्या लिखूं कैसे लिखूं यही सोच में डूबी थी।
अचानक ही इक तेज वायू का झोंका आया,
मेरे बैचेन हुए मन को स्वरों का संगीत सुनाया।
लिखना है यदि प्रेम पर तो सोच में क्यों डूबी हो,
तुम तो स्वयं ही प्रेम की पूर्ण परिभाषा हो।
इतना सुन कर बावरा हुआ मन और भावनाओं का सैलाब आ गया,
उड़ चला वो बन परिंदा और अतीत के गलियारों में पहुंच गया।
कहीं माँ की ममता का प्यार था तो कहीं पिता का अनुशासन के रूप में प्यार दिखा,
कहीं भाई बहिन की तकरार वाला प्रेम तो कहीं दादी-दादू का लाड़-प्यार दिखा।
लेकिन इन सबके बीच भी एक अपूर्णता का एहसास था,
शायद अब भी मुझे अपने हिस्से के प्यार का इंतजार था।
और एक दिन वो दिन भी आया,
जब किसी ने मेरे रिक्त मन में प्रेम का दीपक जलाया।
पाकर अपने हिस्से का प्रेम में पूर्ण हो चुकी थी,
चल पड़ी उस डगर पर जो खुशियों की लड़ी थी।
प्रेम डगर पर चलती हुई मैं सतरंगी सपने सजों रही थी,
पर मेरी ही किस्मत शायद मुझसे दूर हो रही थी।
अचानक ही इक ऐसा तूफान आया, 
बिखर गया वो सतरंगी सपना जो मैंने था सजाया।
चले गए।।हा!!! चले गए तुम,
मुझे फिर से अपूर्ण कर चले गए तुम।
लेकिन तुम जहाँ भी हो मैं भी वही आऊँगी,
इस जहां न सही उसी जहां में अपना आशियाना बसाउंगी।
मैं फिर मिलूंगी जरूर मिलूंगी,
लेकिन कब और कहाँ ये नही पता।
पर शायद तेरे केनवास पर उतरूंगी,
या तुम्हारी ही कल्पना बन कर तुझमें ही समा जाऊंगी।
मैं फिर मिलूंगी इस जन्म या उस जन्म!!!

शीला द्विवेदी "अक्षरा"