आज बहुत ख़ुश थी वो बड़े दिनों के बाद सम्मान जो मिल रहा था उसे अपनी लिखी रचनाओं पर। मन तो मानों आसमान पर पंख लगा कर उड़ रहा था उसका ,इंतज़ार था उसे तो बस मंच से उसका नाम पुकारे जाने का। 
अभी तक शानू की बहू ही तो थी वो,जिसे देखो बस इसी नाम से पुकारता था उसे,हां इसमें कोई बुराई नही थी किन्तु उसका अपना वज़ूद ग़ुम हो चुका था ।।सभी लोग उसका असली नाम भूल चुके थे ।।
उसका अस्तित्व और उसका नाम जो उसके माता- पिता ने बहुत सोच समझकर रखा था।।

किरण 

सूरज की वो किरण जो आसमान पर छा जाती है,अंधेरा दूर भगाती है।
अंधकार मिटाती है।।
कितना प्यारा नाम था।।

लेकिन आज उसका वज़ूद धूमिल पड़ चुका था।हर वक़्त ताने उलहाने , उसकी ज़िन्दगी बद से बद्तर हो चुकी थी लेक़िन इसका जिम्मेदार कौन था???? 
आखिर कई बार इस सवाल का जवाब वो अपने आप से मांग चुकी थी ।।नही मिलता था।।।।।।।


बरसों बाद जब उसे साहित्य अलंकरण पुरुस्कार से नवाज़ा जा रहा था वो दिल को थाम के अतीत के गलियारे में गोते लगा कर आ चुकी थी।।

सहसा ही एक आवाज़ आयी।।

" इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ साहित्य पुरुस्कार दिया जाता है श्रीमती किरण श्रीवास्तव जी को " 

पूरा सभागार खचाखच भरा हुआ था तालियों की गड़गड़ाहट से किरण की तंद्रा भंग हुई।।

एक-2 कदम बड़ी मुश्किल से बढ़ा पा रही थी वो जैसे ही मंच के नज़दीक पहुँची , सहसा ही उसके पति ने उसे गले से लगा लिया और बोला बहुत-2 बधाई हो तुम्हे किरण!!! तुम मेरी हो, और आज तुमने ये साबित भी कर दिया कि हाँ मैं तुम्हारा हूँ।।
कोई भी स्त्री सदा किसी और के नाम की मोहताज़ नही होती है उसका भी अपना एक वज़ूद होता है एक पहचान होती है।।
लेक़िन ये पहचान उसे खुद ही बनानी होती है ।।कोई आये या न आये प्रगति पथ पर बढ़े चलो कोई न कोई ऐसा साथी या हमदर्द अवश्य होगा जो साथ देगा तुम्हारा हर क़दम पर।।
और आज ये बात सच साबित हो चुकी थी।।किरण का हमसफ़र ही उसका अपना वज़ूद ढूंढकर लाने में उसका हमसाया बना।।
 
एकता श्रीवास्तव, इंदौर म.प्र.✍🏻