हां दुःख व्यापता है।
ह्रदय में शूल सा चुभता बहुत है।
पर जीवन यह जो प्रश्न चिन्ह सा
उत्तर मांगता है?
क्या करूं?
विस्मृत यथार्थ को!!
या संवेदना शून्य हो जाऊं?
तुम्हारी स्मृति 
चीर ह्रदय को 
कहां दूर भगाऊ?

हां ••••
तुम चली गई !!
छोङ यादों की श्रृंखला •••
उनमें कुछ तलाशती हूं। 
प्रिय जो ह्रदय को
उसे सहेजती हूं। 

जैसे जोङ कर रखे पैसे
आङे समय 
काम आऐंगे। 

तुम्हारी यादों की पोटली
खोलती हूं। 

जब एकांत हो ••••
टटोलती हूं। 

कुछ पल मीठे से!!
कुछ तुम्हारी आंखों में
 मेरे खातिर  चिंता के !!
कुछ  अभिमान के!!
कुछ मुझ पर विश्वास के!!
कुछ  उम्मीदों के!!

अब यही मेरी तिजोरी है।
जो प्राणों के समान प्यारी हैं। 
                    ✍ डाॅ पल्लवी कुमारी"पाम "