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सुंदर! अनुपम सौंदर्य की रूपरेखा
इस संसार में क्या तुमने तुच्छ देखा,
सजीव या निर्जीव सबके लिए योजना
गढ़ काया वो ही रचता हर रचना,
सारे सजिवों में उसकी सबसे श्रेष्ठ कृति
बनाया जिसको सबसे कोमल प्रवृति,
उसने की होगी जाने कितनी गहन अध्ययन 
तब जाके हे मानव! तूने पाया जीवन,
सारे प्राणियों में सर्वोत्तम तू कब न रहा?
पर ईश्वर के अनुसार तू अब न रहा,
तेरी सर्वोच्चता तुझे धिक्कारती है
तेरे मक्कारी शीर्ष से तुझे उतारती है,
हे! मानव क्यों बदला तूने अपना व्यवहार
क्यूं करता जाता यूं निर्मम अत्याचार
सारे जीव सुनी आंखो से तुझको तकते हैं
ईश्वर का रूप है तू, इसकी लाज वो रखते हैं,
कुरूप न कर इस मंजूल धरा को
स्नेह सिंचित कर जिसे गढ़ता जाता वो
बुद्धी विवेक की तू परिभाषा 
जीव जगत की तू अभिलाषा 
श्वेत श्याम में रंग भरने हेतु
उस पिता ने निर्धारित किया तुझे सेतु
जगा दे मस्तिष्क को जो पड़ा हो तू सुप्त
धरती मृतप्राय हो जाए और ये संसार लुप्त
इससे पहले कर ले अपना हृदय परिवर्तन
बन न किसी कलंक का कोई कारण
ईश्वर का रचा तू सबसे अतुल्य उदाहरण
ईश्वर सा बना तू अपना आचरण
प्रेमपाश में कर इस संसार का वरण
होनी तेरे नाम सौभाग्य लिखे
हे मानव! तू ऐसा कर आचरण

                       कीर्ति रश्मि नन्द ( वाराणसी)