कर्तव्य पथ पर निहित वो सेना का जवान था,
खुद की जान से ज्यादा टिकेंगे का करता मान था।
छोड़कर सारे सुख सरहद पर तैनात था,
हर घड़ी हर पल देता मौत को भी मात था।
छोड़कर परिवार सारा देश को समर्पित हुआ,
वो भारत माँ का लाल बना माँ भारती को अर्पित हुआ
है सदा उत्साह मन में जीतता हर जंग है,
है जोश नया उत्साह नया और नई उमंग है।
जीत कर दुश्मनों को फिर लाज रखी तिरंगे की,
फिर छिड़ी रात बात फूलों की।

एक दिन फिर एक सन्देशा आया है,
घर पर माता-पिता ने बुलाया है।
ले विदा सब साथियों से आज फिर निकल पड़ा,
देश भक्त को वीर आज है माँ बाप का लाड़ला।
आते ही पिता ने एक फरमान सुनाया है,
तेरे लिए एक लड़की का रिश्ता आया है।
मान ले तू बात मेरी घर  बसा ले अपना,
बृद्ध माता-पिता का भी पूर्ण हो सपना।
हर्षित हो स्वीकार की बात फिर अपनों की,
रात है या बारात है फूलों की।

हँसी खुशी से फिर ब्याह सम्पन्न हुआ,
घर में आयी रौनक और हर दिन त्यौहार हुआ।
हँसी खुशी इस तरह दिन कट रहे थे,
बेटे के साथ बहू को देख माँ बाप खुश हो रहे थे।
आखिर वो समय आया जिसका सबको इंतज़ार था,
उम्मीद से हुई बहू और घर रौशनी से गुलजार हुआ।
और एक दिन फिर इक तूफान आया,
जब बेटे ने बापिस जाने का फरमान सुनाया।
रखनी पड़ी है लाज सबको उसके उसूलों की,
शाम फूलों की रात भी फूलों की।

जल्दी आऊंगा ये कहकर बेटा चला गया,
इक नन्हा बीज कोख में डाल वोदेश को समर्पित हो गया।
वो घड़ी बहुत ही कठिन थी जब प्रकृति भी रो रही थी,
भयंकर प्रसव पीड़ा से एक माँ तड़प रही थी।
छिड़ी थी जंग सीमा पर गोली सीने में खायी थी,
पूर्ण की आज वो कसम जो वर्दी पहनते वक्त खायी थी।
अस्त हो रहा था एक तरफ सूर्य तो दूसरी तरफ उदय हुआ,
अंतिम सांस लेने से पहले देश को एक और रक्षक दे गया।
रखूंगी कायम फर्ज और लाज रखूंगी उसूलों की,
आपकी बात बात फूलों की।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"