"कट रहे है जंगल बस रही है बस्तियां"
दूषित हो रहा प्रदूषण मिट रही है हस्तियां।
हर गांव के बाहर बाग बगीचे हुआ करते थे,
जो शीतल छांव तथा स्वच्छ हवा दिया करते थे।
गंगा हुई प्रदूषित अब रही न कोई कश्तियां
दूषित......
बंजर हुई जमीन में बस रेगिस्तान से टीले दिखाई देते है,
गांव की पगडंडियों पर झाड़ दार बृक्ष हमारा स्वागत करते है।
नही मंडराती हुई दिखती है अब फूलों पर कोई तितलियां
दूषित........
होंगे पेड़ पौधे धरा पर तभी तो बरसात होगी,
मिलेगी हमें ऑक्सीजन और हवा भी स्वच्छ होगी।
या खुदा क्या नही सुनाई देती है तुम्हे बेकसूरों की सिसकियां
दूषित........
जंगलों में रहना होता है साधु संतों का,
प्रकृति से जुड़कर ही ध्यान करते है वो ईश्वर का।
प्रकृति से ही प्राप्त करते है हम बहुत सी जड़ी बूटियां
दूषित.......
पर्यावरण को स्वच्छ बनायेगें तभी तो धरती पर हरियाली आएगी,
मिलकर पेड़ लगाएंगे हम तभी तो प्रकृति लहराएंगी।
फिर सुख और समृद्धि से पूर्ण होगी सबकी जिंदगियां
दूषित.....
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश

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