कैसे बतलाऊ क्या क्या करती हूं।
तुझ पे जीती हूं,तुझ पे मरती हूं।।

तुझको हर वक्त सोचती हूं सनम।
और तुझे सदा दिल में भरती हूं।।

तेरी यादों में रोज एक नई गज़ल कहती हूं।
प्यार की हद से यूं गुजरती हूं।।

तुझको पाने की हसरते लेकर।
 दर ओ दर मन्नते मैं करती हूं।।

रेत पे नाम लिख के तेरा कभी।
कहती मैं तुझसे,प्यार करती हूं।। 

उम्र का प्रीत असर लगता है।
अब तो रुसवाई से भी डरती हूं।।
हरप्रीत कौर
शाहदरा, दिल्ली