हां यह सच है कि हमारी खुशियों की जमीन है मां !, पर उड़ने को आसमान पापा ने दिया......
जिस दीवार-ओ-दरख़्त को मां हर दिन घर बनाती रही, खून पसीने से बना हुआ वह मकान पापा ने दिया .......

कभी जाड़े कि शाम अगर मां कहती कि ले लो नई कोट अपने लिए, बच्चों के पास कपड़े बहुत हैं ,तो पापा यह कह कर टाल जाते कि अब पुराने कपड़े की तरह कपड़े नहीं मिलते, जाने क्या हो गया है शहर के दर्जियों को, पुरानी कोट की तरह कोट नहीं सिलते , न जाने कितनी दफा कोट के पैसे से, हमें मनचाहा सामान पापा ने दिया.........

हमारे ख्वाबों में रंग भरते-भरते न जाने कितने ख्वाब पापा के, अधूरे रह गए, मर्द रो नहीं सकते शायद ,यही सोचा होगा पापा ने, इसलिए अपने सारे गम अकेले ही सह गए, कभी  हमसे नहीं कहा कि मुझे भी दर्द होता है , जब चोट तुम्हें लगती है दिल मेरा भी रोता है , हां यह सच है कि उंगली पकड़कर चलना सिखाया मां ने, पर  बेझिझक बोलने को जुबान पापा ने दिया.....

अगर होता अख्तियार और मेरी किस्मत लिखते मेरे पापा , तो चुनकर गम के कांटे खुशियों के फूल लिखते , बेटीयों के लिए जीने के, नये उसूल लिखते , लिख देते फलक के चांद सितारों तक पहुंच मेरी, मां तहजीब सिखाती रही उम्र भर, अपनी वजूद की पहचान, आत्म-सम्मान का ज्ञान पापा ने दिया.....

 पिता जी आप बहुत याद आते हैं
.......✍️ पिंकी मिश्रा