"मिलने को, छुप-छुपकर कुछ दर्द पुराने आते हैं।
पता नहीं कितने ख्वाबों को आंसूं से धो जाते हैं।

पता चला है, मेरा रिश्ता उससे जन्म-जन्म का है।
अब तो साथ बिना उसके हम रह नही पाते हैं।

 इंतजार करते हैं , उसका हम बड़ी बेताबी से।
पतझड़ में भी उम्मीदों से फूल खिलाते हैं।।

इस उल्फत की राह ने  कैसी आग लगाई है।
नैना सावन के मौसम सी झड़ी लगाते हैं।।

हमने ही खुद जीवन में उलफत महकाई है।
गम ए दिल हम दुनिया से कह नही पाते हैं।।"
                                अम्बिका झा ✍️