अपनत्व की यथार्थता, सर्व जन के पुलकित मन, हृदय में निवास निश्छल नेह का,
मीठी बोली का मंतर, हरियाली सदाबहार, न शोर, न गुल,
बरगद की छांव, नीम की दातुन,
वो चूल्हे की रोटी व कुएं का पानी,
जहां चित्रित होती है सबकी कहानी,
जब कहानी का किरदार भूला बिसरा पुनः वापस आता है,
तब गांव हमें अपनाता है।
निज चादर का आकार बढ़ाने,
क्षणभंगुर जगमगाहट को पाने,
जन देश की सभ्यता व संस्कृति पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
गांव की गलियों को सूना कर ,
गांव का राजा शहर का गुलाम बन जाता है।
जब गुलामियत का आलम हमें न भाता है,
तब गांव हमें अपनाता है।
तात्कालिक परिप्रेक्ष्य ने गांव के औचित्य पर प्रकाश डाला,
दंगों से दहला, महामारी से घबराया जन गांव की ओर भागा।
गांव की आत्मीयता को रौंद,
जिसने कभी शहर की भौतिकता को अपनाया।
आज उसी ने अपने बुजुर्गों के सायं तले सुखों चैन पाया।
जब हम झंझावातों के चक्रव्यूह में फंस हार मान जाते है,
तब गांव सारथी बन हमारी आत्मा का मंथन कर ,
हमें विजयी का आभास कराता है
और हमें अपनाता है।
स्वरचित एवं मौलिक
मानसी शर्मा
पश्चिम बंगाल

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