कभी पति में देखती हूँ, 
मेरी माँ के सुहाग को
तो कभी भाई में देखती हूँ, 
उस संघर्षशील इंसान को।

बैठकर बगियां में अपनी, 
कभी-कभी रोते है पापा,
अपनी जवानी के दिनों में अक्सर,
 जब खोए हुए होते है पापा।

अब खुद में ही कहीं खो रहे है, 
शायद अब कमाते नहीं है पापा,
अब दिन में ही सो रहे है,
 इसलिए किसी को भाते नहीं है पापा।

संघर्षों में तपकर खुद को,
 सोना जिसने बनाया पापा
आज उसी सोने को हमने, 
फिर से राख बनाया पापा

माता से तो खूब जुड़े हम, 
तेरा हाल ना जाना पापा
कांधो पर तो खूब चढ़ाया, 
रह-रह के खयाल आता है पापा।

मन की अपार वेदनाओं को, 
दिल में ही समाते हो पापा
झूठी मुस्कान दिखाने की ताकत, 
कहो कहाँ से लाते हो पापा।

बुढ़ापा झलकता है आँखो से जिनकी, 
नातिन को देख खिल जाते है पापा
रोज शाम को ढूँढ के लाठी, 
पोते को ले निकल जाते है पापा

पापा पर कविता लखती हूँ, 
तो आँसू रोक नहीं पाती
उन्हीं की तरह जज्बात अपने, 
किसी से बोल नहीं पाती

खुशहाल हमारा बचपन इतना,
तुम से ही तो था ना पापा
अब ये सारा जीवन सुखमय,
तुम से ही तो है ना पापा

तब कितनी शिकयतें थी तुमसे,
जब हमारे लिए जीते थे पापा
देखो कोई शिकायत नहीं है तुमसे,
अब खुद के लिए भी जिओ न पापा
अब खुद के लिए भी जिओ न पापा

'मेरे प्यारे-प्यारे पापा'

रंजना सोनी
(स्वरचित एवं मौलिक)