ये पिता तेरा त्याग मैं समझती हूं।
उंगली पकड़ कर तूने चलना सिखलाया है मुझको।
कांधे पर बिठाकर सारा जहाँ दिखलाया है मुझको।।
बेटी हूँ आपकी ये अभिमान सदा करती हूँ।
ये पिता तेरा.........
माँ तो ममता की सरिता है थोड़ी बर्षा में उफनाती है।
पर पिता शांत सागर जैसा जिसमें सारी सृष्टि समाती है।।
इस अदृश्य प्रेम में छिपा बलिदान मैं समझती हूँ।
ये पिता तेरा..........
मैं कली हूँ लता की माँ ममता की एक बेल है।
है लता और कली जिस परआश्रित आप बो शक्तिशाली पेड़ है।।
आपके ही प्रेम छांव में मैं फूलती और पनपती हूँ।
ये पिता तेरा..............
हो ग्रीष्म ऋतु बरसात हो या शीत का आलम हो।
हर वक्त है तू कर्म रत चाहे रात्रि हो या दिवस हो।।
आपके ही प्यार में सब स्वप्न पूरे मैं करती हूँ।
ये पिता तेरा..............
हर पिता की ये ख्वाहिश होती है कि उसकी बेटी को ऐसा ससुराल मिले।
पलकों पर बिठाकर रखे उसे ऐसा कोई राजकुमार मिले।
बिदाई के वक्त माँ की अश्रु धारा बहती है।
पर आपकी मौनावस्था ही आपका दर्द बयां करती है।
डोली में बिठा दिया आपने अपने दिल पर पत्थर रखकर
ये आपकी बेटी जानती है।
ये पिता तेरा त्याग मैं समझती हूँ।
स्वरचित एवं मौलिक
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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