चल वहाँ जाते हैं,
मन जिधर हो,उधर
कुछ वक्त बिताते हैं,
भूलते हैं कुछ पल जहाँ को
सुकूँ की तलाश में
कहीं घूम आते हैं....।
चल वहाँ जाते हैं,
बन्धनों का बोझ हल्का हो जहाँ
उस गठरी को वहीं
छोड़ आते हैं,
मैं देख सकूँ तुझमें जग सारा
ऐसी किसी जगह पर
चल पनाह पाते हैं.....।
चल वहाँ जाते हैं
बैठ सके कुछ पल साथ में
जहाँ अतीत के किस्से
नजर आते हैं,
मुस्कुरा सकें अपनी गलतियों पर
भविष्य का निर्माण
जहां पाते हैं....।
चल वहाँ जाते हैं,
तू सुन सके हर बो बात
जो लब मेरे
कह न पाते हैं,
स्पर्श ही संकेत की भाषा हो
मन जहां
कहकहा जाते हैं.....।
चल वहाँ जाते हैं,
सफर में मोहोब्बत या
मोहोब्बती सफर
जहां पाते हैं,
भागते पीछे उस पर्यावरण में
चल फिर से
खो जाते हैं....।
स्वरचित व मौलिक✍
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस
आगरा

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