स्वाति जहां थी वही खड़ी रह गई । स्वाति को यूं खड़े देख उसे उसके कमरे में लेकर गई और आराम करने को कहा और रुम से बाहर आ गई । प्रीति के जाने के बाद स्वाति वही बेड पर बैठ गई । राजेश के व्यवहार से वह इतना तो समझ गई कि राजेश जी को जरूर कोई परेशानी है जिसकी वजह से वो परेशान हैं । यही सब सोच रही थी कि रुम के बाथरुम का दरवाजा खुला और राजेश कपड़े बदल कर बाहर आ गया । स्वाति , राजेश को देखकर थोड़ा असहज हो गई । और बैड से उतरकर खड़ी हो गई । राजेश ने स्वाति को असहज देखा और रूम से बाहर निकल आया । लेकिन कुछ सोचकर वो रूम में वापस आ गया । राजेश ने अपने और रिचा के बारे में सब कुछ बाताने का निर्णय ले लिया । स्वाति ने शर्म से अपना सर झुका लिया । स्वाति ! राजेश ने कहा - मैं तुम्हें धोखे में नहीं रखना चाहता । इसलिए मैं तुम्हें सब सच साफ़ - साफ तुम्हें बताना चाहता हूं । जिसे सुनकर तुम मेरे साथ शायद ही रहना चाहोगी । इतना सब कह कर राजेश कुछ देर के लिए चुप हो गया । स्वाति ने राजेश को चुप देखकर कहा - ऐसी कौन सी बात जिसे कहते हुए आप चुप हो गए । राजेश थोड़ा गंभीर बनते हुए कहने लगा - स्वाति मैं किसी और से प्यार करता हूं और मैं उसे कभी भी भूल नहीं पाऊंगा । वो मेरे दिल में ही नहीं मेरी आत्मा में भी बसी हुई है । उसकी जगह तुम नहीं ले सकती । मेरी जिंदगी में सिर्फ और सिर्फ रिचा के लिए जगह है और किसी के लिए नहीं । तुम्हारे लिए भी नहीं । स्वाति मैंने ये शादी सिर्फ पापा के कहने पर की है । मैं तुम्हारी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हूं , तुम्हें हर वो चीज मिलेगी । जिसकी तुम हकदार हो । समय के साथ मैं तुम्हें अपनी पत्नी मान भी लूंगा । लेकिन रिचा की जगह मेरे दिल में है उसकी जगह तुम कभी नहीं ले पाओगी । इतना कहकर राजेश अपने कमरें से बाहर आ गया और स्वाति जहां खड़ी थी वहीं खड़ी रह गई । इतना सब जानने के बाद स्वाति इस घर में बिल्कुल भी रहना नहीं चाहती थी । वो अपने कमरे से निकल कर बाहर दरवाजे पर आ गई और जैसे ही बाहर जाने के लिए अपना पैर उठाया । स्वाति को अपने पापा की कही बात याद आ गई....
" बेटी हमेशा अपने मायके और ससुराल का मान बनाये रखना । चाहे परिस्थिति कैसी भी हो अपनी हिम्मत और सूझबूझ से काम लेना । बेटा सब कहते हैं कि , बेटियां शादी के बाद पराई हो जाती है । लेकिन मैंने ऐसा ना कभी सोचा और ना ही अपने बच्चों को ऐसा सिखाया । ये घर अब भी तुम्हारा है और हमेशा तुम्हारा रहेगा । लेकिन बेटा कभी ऐसी परिस्थिति बने जब तुम वहां नहीं रहना चाहती तो बेशक तुम यहां चली आना लेकिन एक बार ठंडे दिमाग से सोचना कि वाकई में समस्या इतनी बड़ी है कि तुम अपना घर और अपने अधिकार छोड़ कर अपने कदम पीछे खींच ओगी या उस समस्या से डटकर सामना करोगी । अपने आप को कभी भी अकेला मत समझना मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा " यही कहा था पापा ने ! मैं ऐसे घर छोड़कर नहीं जा सकती । यही सोचकर स्वाति ने अपने कदम पीछे खींच लिए ।
अरे बेटा तो इतनी रात को यहां क्या कर रही हो ! " गोपाल प्रसाद जी ने पूछा " बाबूजी वह मैं यहां ....ऐसे ही ... बोलकर स्वाति चुप हो गई । गोपाल प्रसाद जी - जाओ बेटा जाकर आराम कर लो तुम बहुत थक गई होगी । जी बाबू जी कह कर स्वाति अपने कमरे में चली गई । उसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी । सुबह - सुबह किसी के दरवाजा खटखटाने से उसकी नींद खुली ।
क्रमशः
रचनाकार
श्वेता सोनी

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