नीचे गंगा की निर्मल धार...
ऊपर उठता धुँए का गुबार...
अर्द्धरात्रि का सूना प्रहर...
सामने विस्तृत फैला नीला अम्बर।।
कुछ विशिष्ट रूप से सजाया हुआ,
सूखी लकड़ियों का ढ़ेर...
उस पर लेटा हुआ माँ का
पार्थिव शरीर।
निर्विकार, निश्छल, देवत्व से पूर्ण।
मुख पर अपूर्व शांति की भंगिमा..
जैसे कह रही हो..
बड़ा सुख है....
इस अंतिम पड़ाव में।
जाने क्यूँ लोग इतना घबड़ाते हैं,
इस निर्मल श्मशान से...
कितना निर्मल है यहाँ सभी कुछ..
अपनी नग्न अवस्था में।
कोई आडम्बर नहीं,
कोई अमीर -गरीब नहीं,
कोई ब्रांडिंग नहीं..
बस सब जल जाना है,
जल कर राख़ हो जाना है।
पार्थिव शरीर को ढ़के हुए कपड़े।
सिल्क , बनारसी, या सूत -कते...
चिर निद्रा में सो जाना है...
यहाँ कोई उठाने नहीं आएगा,
सोने से जगाने नहीं आएगा ।
कोई प्रश्न पूछने नहीं आएगा,
न कोई दर्द दे पायेगा।
इस नीरवता में मुझे देर तक सोने दो।
मुख पर फैली शांति को न खोने दो।
इस मुक्ति में कितना सुख है....
मुझे मुक्त होने दो।
अगणित प्रश्नों से,
इस उहापोह से,
इस रुग्ण शरीर से,
इसमें फैलते पीड़ा से,
बस मुक्त हो जाने दो
मुझे इस सुःख में रहने दो।
जाने क्यूँ लोग इतना घबराते हैं,
इस अंतिम पड़ाव से...
सुःख की अंतिम बेला,
संसार की निःसारता,
सब रिश्तों -नातों से,
झूठ की ऊँची दीवारों से।
अब आगे की यात्रा मेरी निर्बाध रहने दो।
मुझे यहाँ देर तक सोने दो,
नीचे गंगा की निर्मल धार...
सूखी जलती लकड़ियों का अम्बार...
ऊपर दूर तक फैला नीला अम्बर...
इसमें मुझे एकाकार होने दो।
मुझे चिर निद्रा में सोने दो,
रिश्तों का भार न दो...
मुझे मुक्त होने दो,
इस अंतिम पड़ाव में अकेला रहने दो।।
स्वरचित और मौलिक
डॉ पल्लवी कुमारी "पाम "
अनीसाबाद, पटना

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