दिनकर नभ का ऐसा संगम,
दृश्य उपस्थित करता विहंगम,
आँखें भी सूरज सी चमकती है-
कर ले यदि हम इसे हृदयंगम।
लुकाछिपी खेले दिनकर बादल संग,
उदयास्त हो बने जीवन का मलंग,
संसार लिए कहीं धूप कहीं छाँव है-
सूरज की लालिमा ले चमके उत्तंग।
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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