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सौरव तुम दोषी हो !
हाँ तुम ही दोषी हो l
तुमने वध किया हैं ,
हाँ तुमने वध किया हैं l
लोलो की भावनाओ को दहला
लोलो की संभावनाओं को कूचला
सौरव तुम हत्यारा हो !
हाँ तुम ही हत्यारा हो l
लोलो के प्रेम शैशव को
असमय प्रोढ करने का,
उनके ह्रदय को विरह के घृत से
प्रज्वलित कर तड़पने का !
उनके पथ को कंकरीले कर,
हौसलों को रक्तरंजित करने का!
उनके जीवन की हरीतिमा को
मरुभूमि में परिवर्तित करने का l
सौरव,तुमने वध किया हैं !
हाँ तुमने ही वध किया हैं l
आशाओं के अंकुरण से पहले,
साँसो की गति बाधित करने का l
नेह के जन्म से पहले ही,
गर्भ में ही भ्रूण मर्दन का l
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डॉ. ज्योति सिंह वेदी "येशु "
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स्वरचित एवं मौलिक रचना
प्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित

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