सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया.........की अवधारणा युगो-युगो से भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग रही है। उस संस्कृति का जिसमें  सह अस्तित्व का भाव न केवल इंसानों अपितु सभी जीवो के लिए भी है,विशेषकर वन्यजीवों के लिएl जिनके साथ रहने की क्षमता यहाँ लोगों के हृदय में गहरी पैठ बनाए हुए हैं l

           परंतु "जियो और जीने दो" के सिद्धांत वाले इस देश से 20 वीं सदी के मध्य तक आते- आते हैं एशियाई नस्ल के चीते और शेर दोनों ही लुप्त प्राय हो गए थे और अब बारी थी बाघों कीl यह वह दौर था जब रैशेल् कार्सन  सभी वन्य जीवो के संरक्षण हेतु यूरोप में अभियान चला रही थी जिसने कहीं न कहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी काफी प्रभावित किया, फलस्वरुप वर्ष 1971 में उन्होंने सिर्फ बाघों के शिकार पर ही पाबंदी लगाई बल्कि वन्य जीव संरक्षण कानूनों को भी शक्ति प्रदान कीl टाइगर रिजर्व( जिनकी संख्या प्रारंभ में 9 थी पर अब 50 तक हो चुकी है)और टाइगर टास्क फोर्स का गठन उनकी इसी मुहिम का  हिस्सा थे।
            तत्काल तो यह प्रयास उतने प्रभावी न लगे परन्तु धीरे- धीरे सभी लोगों को यह अहसास हुआ कि " प्रकृति पर खतरा मंडराने लगा है"l 4 सितंबर 2006 को संशोधित वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया गया जिस के मुख्य कार्य  निम्नांकित थे-

1.बाघों की स्थिति, रखरखाव इत्यादि के विषय में देशव्यापी मूल्यांकन करना l
2. बाघ संरक्षण योजनाओं को मंजूरी देनाl
3. बाल संरक्षण योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन हेतु वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी और कानूनी सहायता सुनिश्चित करना l
4. वन्य प्रबंधन,सुरक्षा उपाय तथा विशिष्ट पर्यावरण के विकास को सुनिश्चित करना आदि l

        बाघ संरक्षण हेतु जो वैज्ञानिक व सामाजिक उपाय किए गए वह कुछ इस प्रकार से हैं -
-बाघों की आबादी  के निकट वाले गांवों को अन्यत्र बसानाl
- उन जीवों का संरक्षण करना जिनसे बाघ अपना भोजन प्राप्त करते हैंl 
 -संरक्षण हेतु स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना तथा शिकार बने पालतू पशुओं व  इंसानों  हेतू मुआवजे का प्रावधान करनाl
        
       और इन्हीं उपायों का परिणाम है कि वर्ष 2018 की बाघ जनगणना रिपोर्ट के अनुसार  दुनिया के 70% बाघ इस समय भारत में रहते हैं जबकि इस समय समस्त विश्व के बाघ संरक्षण क्षेत्र का केवल 25% ही यहाँ उपलब्ध है l इसके अतिरिक्त पिछले 12 साल में देश में में इनकी संख्या में दोगुनी वृद्धि दर्ज की गई है साथ ही 2010 से 2018 के बीच इनकी आबादी 74% बढ़ी हैl सर्वाधिक बाघों की संख्या वाले शीर्ष राज्यों की चर्चा करें तो वह मध्य प्रदेश कर्नाटक और उत्तराखंड हैl  मध्यप्रदेश का पेंच टाइगर रिजर्व बेस्ट सूची में प्रथम स्थान पर है l
          पर इसी रिपोर्ट के आंकड़ो का एक दूसरा पहलू भी है जिसके अनुसार वर्ष  2018 की बाघ जनगणना में यह बात  स्पष्ट है कि 2012 से 2017 तक जिन कुल 560 बाघों  की मृत्यु हुई है उनमें से 38% का अवैध शिकार किया गया हैl इसके  कारणों तह में अगर जाए  तो ऐसा पाया गया है कि बाघों के साम्राज्य में डिजिटल कैमरे तथा घूमने की छूट  तस्करों को यहाँ तक पहुँचने और और शिकार की योजनाएँ बनाने में बड़ी सहायक सिद्ध हुई है l इसके अलावा इनमें से कुछ बाघ कभी-कभी आदमखोर में तब्दील हो जाते हैं जिससे नजदीकी आबादी को बहुत खतरा होता है और यहीं से इंसानों और बाघों में संघर्ष शुरू हो जाता हैl वनों के विनाश को भी एक बड़ा कारण माना गया है l
            इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए इनके संरक्षण हेतु वर्ष 2010 से प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को विश्व बाघ संरक्षण दिवस मनाया जाता हैl I इसी कड़ी में  इस वर्ष का थीम है - "दियर सर्वाइवल इन आवर हैंड"। तो चलिए एक इंसान, एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते अपना कर्तव्य निभाते हुए अपने देश की शक्ति, शान ,सतर्कता और बुद्धि के प्रतीक इन बाघों को हम संरक्षण प्रदान करें साथ ही साथ सेंट पिट्सबर्ग में निर्धारित 2022 तक इनकी  दुगुनी आबादी के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में इनके अवैध शिकार व तस्करी को रोकने में सहयोग करेंl
     
 "जब तक इंसान की इंसानियत सोती रहेगी, 
तब तक पशुओं की प्रजातियाँ लुप्त होती रहेगी l"


-निगम झा 
स. उप- निरीक्षक
स. सी. बल
सिलीगुड़ी