मत पूछों उस दौर की कैसी थी प्रेम कहानी,
झुकी पलकों से शुरू होती थी एक जज्बों से भरी कहानी।
महबूब कहाँ मिलते थे,अगर मिल भी लेते तो भी ,
रह जाती होंठो में सिमटकर आह बेमानी।
अक्सर चेहरे को दुपट्टे में छुपा लेते थे,
सिर्फ वो ही देखे कुछ ऐसे मुस्कुरा देते थे,
उन चंद लम्हों के मिलन से ही बनती थी प्रेम कहानी।
पर जो भी पल थे नजदीकियों के बहुत लाजबाब थे
उस पाक मोहब्बत के चाँद तारे गवाह थे,
दिल से मिलते थे दिल था हर ताल्लुकात रूहानी।
एक शहर में होकर भी कम मिलते थे,
अक्सर एक दो दिन नही महीनों को बिछड़ते थे,
न पूछो कितना बरसाते थे नयना अखियों में पानी।
यह कहना तो गलत है कि मोहब्बत न की,
पर यह भी उतना ही सच है कभी कोई हिमाकत न की,
रखा दिल को उसूलों से दवाए न कि कभी कोई मनमानी।
दोनों का मिलना मुश्किल था,
पर कब यह बातें सुनता दिल था,
जब मिलते पतझङ में गुल खिलते, बिछड़ने पर हो जाती आँखे शादमानी।
वो भी कभी पलकें उठाते नही है,
वो भी राहों में बतियाते नही,
था कितना ख्याल सुर्ख रूह न थी एक रत्ती बेईमानी।
कैसे सुनाए दिल की बातें , रह गईं मन में कितनी आहटें,
मत पूछो बीते लम्हों की प्रेम कहानी,
हो जातीं हैं दिल की यादें स्यानी।
जब भी गुजरें उन राहों से, बुलाती हैं यादें ,
दिल को दर्द से भर देती वो राहें कभी की थी मुलाकातें,
बस आज भी पलकों के कोर पर रिसती बनके अश्को की
निशानी।
अन्जू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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