सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् क्योंकि सत्य,
एक परीक्षण है,
एक द्वंद है,
वक्ता के साहस और श्रोता की सहनशक्ति का
जिसमे एक सत्य कह नहीं पता और दूसरा,
सत्य सुन ही नहीं पाता
और गर इस मूक बधिरता पर
अभिमन्यु सा पार पाता दिखे सत्य
तो फिर घेर लेते है
अन्याय के सात नहीं,
सहस्त्र कोटि महारथी l
शुरू होते है अगणित वार जिनका कोई अंत नहीं होता
फूट पड़ता है जैसे असाध्य सी
पीड़ा का कोई हृदय विदारक सोताl
तो फिर आखिर क्या मिला इस अभिमन्यु को? क्या वीरगति?
नहीं ,अभी कुछ शेष है
अर्धमुर्छित, अर्ध विक्षिप्त सा
कड़ाहता हुआ
क्या वही सत्य?
हाँ पर साथ लिए
न ब्रूयात् सत्यं अप्रियम भी l
- निगम झा
सब इंस्पेक्टर, एस. एस. बी. सिलीगुड़ी

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