वैसे तो शांताराम जी ने डाक्टर साहब से रिश्ते के लिये हाॅ बोल दी। पर डाक्टर साहब थोड़े आधुनिक ख्याल के लगे। उन्होंने निर्मला की इच्छा को भी महत्व दिया। आखिर एक बेटी का भी अधिकार है कि वह अपने भावी पति के बारे में सब जान ले। निर्मला के लिये तो पिता जी के निर्णय के बाद डाक्टर निरंजन के पुत्र डाक्टर अनुराग से मिलना बस औपचारिकता ही थी।
डाक्टर अनुराग ने पहली ही मुलाकात में निर्मला को प्रभावित कर लिया। निर्मला उनकी विनम्रता की कायल हो गयी। अनुराग की आदतें बहुत कुछ उसके पिता जैसी थी। उसके व्यवहार से यही लगा कि उसे निर्मला पसंद है क्योंकि निर्मला एक गुणी लड़की है।
आखिर विवाह की तैयारियां शुरू हो गयी। निर्मला एक पढी लिखी लड़की है। उसे कभी कोई रोकटोक नहीं रही। खुद के विवाह की तैयारी भी वह खुद ही कर रही है। इसके लिये अनेकों बार वह अपनी ससुराल भी गयी। उसके मन मंदिर में अभी भी विशाल की तस्वीर है। पर वह जितनी बार अनुराग से मिलती, उतनी ही विशाल की तस्वीर धुंधली होती जाती। अभी भी विशाल उसके सपनों का हिस्सा बनता है पर बहुत कम। जिस तरह निर्मला के मन में विशाल की जगह अनुराग को मिल रही है, उससे लगता यही है कि एक दिन विशाल की पूरी तस्वीर मिट जायेगी। उसकी जगह पर अनुराग की ही तस्वीर होगी। शायद आगामी समय में निर्मला के सपनों में विशाल को कोई स्थान नहीं होगा।
आज क्लीनिक में निर्मला का मन नहीं लग रहा है। पता नहीं क्यों इच्छा हो रही है कि अनुराग उसके साथ हो। लगता है कि आज उसके मन में अनुराग के लिये वही भाव उठ रहे हैं जो कभी उसके मन में विशाल के लिये थे। आज पता नहीं क्यों मन वैचैन हो रहा है।
मीना नर्सिंग होम की नर्स बार बार निर्मला को देखकर मुस्करा उठती है। मीना निर्मला की बचपन की सहेली है। दोनों साथ साथ पढा करती थीं। मीना पढाई में इतनी मेधावी न थी कि वह डाक्टरी की पढाई कर सके। पर ईश्वर ने एक ही राह नहीं बनायी है। मीना भी नर्सिंग की पढाई कर इसी नर्सिंग होम में काम कर रही है। मीना की शादी कई साल पहले हो चुकी है। तो वह जानती है कि शादी तय हो जाने के बाद किसी लड़की के मन की क्या दशा होती है।
" तो अब तो हमारे जीजाजी दिन में भी सपनों में आने लगे हैं क्या?"
मीना की हसी गूंजी और निर्मला झेंप गयी।
" तू भी मीना। कभी भी कुछ बोल देती है। इतने पैशेंटों की भीड़ है। तुझे मजाक सूझ रहा है।"
विशाल चैबर में एक तरफ नर्सिंग होम की मुख्य संचालिका डाक्टर रजनी भी इन दोनों सहेलियों की झड़प देख रही थीं।
" वैसे मीना सही बोल रही है। आजकल तुम्हारा ध्यान कहीं और ही रहता है। और कहाॅ रहता है भला। "
फिर चैबर में एक हसी गूंज उठी। निर्मला ने जब देखा कि मैडम भी मीना के साथ मजाक के मूड में हैं तो फिर वह उनके पास पहुंच गयी।
" मैडम। आज पता नहीं क्यों। थोड़ा घर जाने का मन हो रहा है। "
" घर या डाक्टर अनुराग से मिलने का। "
पीछे से वही मीना की हसी। साथ में डाक्टर रजनी भी मुस्करा उठीं।
" होता है। सभी के साथ होता है। अच्छा तुम आज जल्दी चली जाओ। अब तो वैसे भी अकेले काम करने की आदत डालनी है। कुछ दिनों बाद तो तुम अपने ससुराल के अस्पताल को सम्हालोंगीं। जाओ। "
डाक्टर रजनी ने एक साथ बहुअर्थी बातें बोल दीं। निर्मला का मन हुआ कि आशुतोष को फोन कर बता दे। फिर दोनों ही कहीं एकांत में थोड़ा समय बितायें। पर फिर झिझक गयी। आज तक कभी न झिझकने बाली लड़की बार बार झिझक रही है तो यह उसके मन में उठे प्रेम की निशानी है।
निर्मला डाक्टर निरंजन के अस्पताल की तरफ बढ ली। वैसे अभी दो ही दिन पूर्व वह वहां गयी थी। पर आज मन में संकोच हो रहा था। डाक्टर साहब पिता जी के समकक्ष हैं। उन्होंने पूछ लिया कि बेटी आज कैसे। फिर कुछ न कुछ बहाना बनाना होगा।
निर्मला आज बिना बताये अपने ससुराल के अस्पताल में पहुंच गयी। आज उसे वहां मरीज तो दिखे। पर न तो डाक्टर निरंजन दिखे और न डाक्टर अनुराग। थोड़ी देर एक कुर्सी पर बैठकर इंतजार करने लगी। तभी अस्पताल के एक कमरे से कुछ आवाजें आने लगीं। ये तो डाक्टर निरंजन की आवाजें हैं। निर्मला उसी दिशा में बढ ली।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

0 टिप्पणियाँ