दूरियां तब तक मन को दुखी नहीं करतीं, जब तक दूरियां हो। जैसे ही दूरी कुछ नजदीकी में बदलती है, फिर मिलन की बेकरारी ज्यादा ही बढ जाती है। लक्ष्मी के जन्म दिन के अवसर तक विशाल ने सोचा भी न था कि उसकी शादी लक्ष्मी से ही तय हो जायेगी। आनन फानन में इतना बड़ा निर्णय हो जायेगा। अनेकों वर्षों से स्वप्न में जिस लक्ष्मी को अपना जीवन साथी के रूप में देख रहा था, वह वास्तव में उसके जीवन का हिस्सा बन जायेगी। मिलन के लिये एक एक दिन मुश्किल से कट रहे थे। फिर भी मन की भावनाओं को एक तरफ रख आखरी परीक्षा की तैयारी में जुटा रहा। जैसे ही आखरी परीक्षा हुई, वह तुरंत घर को इस तरह भागा, मानो पिंजरे में बंद परिंदा आजाद हो गया हो।

   विशाल का बहुत मन था कि विवाह से पूर्व ही वह कुछ समय लक्ष्मी के साथ गुजारे। कभी किसी रैस्टोरेंट में उसके साथ डेट पर जाये। कहीं सिनेमा में उसके साथ जाये। ताकि उसकी पसंद समझ सके। फिर लक्ष्मी की पसंद के आधार पर उसे जीवन भर सारी खुशियां दे सके। पर उसे ऐसा मौका न मिला। जब वह घर आया तो शादी के महज दस दिन शेष बचे थे। दोनों ही घरों में शादी की जोरशोर से तैयारियां चल रही थीं। सभी रिश्तेदारों को निमंत्रण भेजे जा चुके थे। अब ज्यादा नहीं हो सकता है। फिर भी किसी एक दिन लक्ष्मी को किसी काफी शाप पर तो बुला सकता है। पर यह काम भी तुरंत ही करना होगा। क्योंकि हल्दी की रस्म के बाद लड़कियां घर से बाहर नहीं निकलती। हालांकि बहुत आवश्यक होने पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।

   आज विशाल शादी से पूर्व लक्ष्मी से मिलने जा रहा है। आज वह लक्ष्मी के मन की बात जानने की कोशिश करेगा। ताकि वह लक्ष्मी को जीवन भर खुश रख सके।

   शहर के एक मंहगे काफी शाप में एकांत की एक मेज विशाल और लक्ष्मी के लिये रिजर्व थी। मेज के बगल में एक बड़े से कांच के बर्तन में भरे पानी में रंगबिरंगी मछलियां माहौल को और रोनक प्रदान कर रही थीं। विशाल और लक्ष्मी दोनों आमने सामने बैठे हुए थे। कभी लक्ष्मी, इन्हीं विशाल को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानकर अपने मन की उलझन बताना चाहती थी। आज उसके सामने उसका वही दोस्त बैठा था। पर सबसे अच्छे दोस्त का संबंध बहुत पीछे छूट चुका था। आज लक्ष्मी अपने मन को विशाल से छिपाने की कोशिश कर रही है। और विशाल लक्ष्मी के मन को पढने की।

   कहते हैं कि प्रेम में वह शक्ति होती है जो साधारण मनुष्य को असाधारण बना देती है। प्रेमी मन की बातों को केवल नजरों से पढ लेता है। वह जिससे प्रेम करता है, उसी की खुशी में अपनी खुशी देखता है। इसके लिये कोई भी बड़ा सा बड़ा त्याग वह कर सकता है।

   दोनों बहुत देर तक शांत रहे। विशाल बार बार लक्ष्मी की आंखों में देख रहा था और लक्ष्मी बार बार विशाल की नजरों से अपनी नजरें चुरा रही थी। जैसे कि कोई चोर अपनी चोरी छिपाने की कोशिश कर रहा हो। आखिर पहल विशाल ने ही की।

  " लक्ष्मी। अब हमारे विवाह को कुछ ही दिन शेष बचे हैं। कुछ दिनों बाद हम धर्म से एक दूसरे के जीवन साथी बन जायेंगें। मुझे नहीं लगता कि आपको मेरा साथ पसंद न हो। फिर भी समझता हूं आपको भी मुझसे कुछ अपेक्षा होंगी। आप इस समय अपने मन की बात मुझसे बेहिचक बोल सकती हैं। "

   विशाल के प्रश्न का लक्ष्मी के पास कोई उत्तर नहीं था। बस नजरें नीची कर बैठी रही। इतने में बैरा काफी के दो कप और कुछ स्नेक्स ले आया। दोनों धीरे धीरे काफी पीने लगे। लक्ष्मी अपने मन को लज्जा के नकाब से छिपाने की कोशिश करती रही। उसे उम्मीद यही थी कि इस तरह नजर चुराने को विशाल उसके प्रति प्रेम समझकर भ्रमित हो जायेगा। सत्य कभी सामने नहीं आयेगा। पर लक्ष्मी गलत थी। सत्य तो पहले ही उसकी जन्मदात्री माॅ के समक्ष आ चुका था।

   प्रेम के समक्ष कुछ भी अदृश्य नहीं रहता है। प्रेम में सबसे ऊपर माॅ का प्रेम  कहा जाता है। पर इतिहास में कुछ ऐसे भी प्रेमी हो चुके हैं जिन्होंने प्रेम के लिये अपनी जान तक दाब पर लगा दी। जिन्होंने प्रेम के लिये अपना सुख भी त्याग दिया। 

  आज लक्ष्मी के सामने बैठा विशाल उसका मित्र नहीं था। हालांकि मित्रता प्रेम की पहली सीढी है। फिर भी मन ही मन प्रेम साधना कर आज वह उस ऊंचाई पर तो था कि उससे यह अपेक्षा की जा सके कि वह लक्ष्मी के छिपाने के बाद भी उसके मन को पढ सके। 

   विशाल ने लक्ष्मी का मन पढ लिया। जैसे हिमालय की ठंडी वादियों में विचरण करता हुआ अचानक कोई रेगिस्तान की गर्मी में आ जाये, तो उसके मन की क्या दशा होगी। लक्ष्मी के साथ जीवन जीने का सपना उसे टूटता दिखने लगा। वैसे जो उसे महसूस हुआ, उसके बाद भी उसके स्वप्न पूर्ति में कोई बाधा नहीं थी। साधारण लोगों के लिये खुद के स्वप्न महत्वपूर्ण होते हैं। पर प्रेमी कभी भी साधारण तो नहीं होता। प्रेमी वही करता है, जो साधारण लोग नहीं करते। 

   एक बार माहौल फिर बहुत शांत हो गया। विशाल के मन की बैचैनी को सही सही बखान नहीं किया जा सकता। उसके मन में इस समय दो विशाल बैठे थे। एक उसे बोलता कि इस मामले में मत पड़। बस कुछ दिनों की बात है। लक्ष्मी तेरी होने ही बाली है। जब वह तेरे साथ जीवन के रंग देखेगी तो अपने मन में बसे प्रेमी को भूल जायेगी। उसकी यादों का हिस्सा तू ही बनेगा। 

  मन का दूसरा विशाल जो प्रेम साधना करते करते किसी महान संत की स्थिति में खड़ा था, मन की दुर्बलता बाले विशाल को फटकार रहा था। मूर्ख। खुद के लिये सोचना भी क्या प्रेम है। खुद के लिये तो मनुष्य नहीं जीते। फिर प्रेमी तो वही है जो खुद की न सोचे। प्रेमी बस त्याग करना जानता है। तेरा यह सोचना भी गलत है कि लक्ष्मी अपने प्रेम को भूल जायेगी। प्रेम भी क्या कोई भूलने की चीज है। क्या तू खुद लक्ष्मी को जीवन भर भूल सकता है। नहीं ना। तो लक्ष्मी भी भला कैसे अपना प्रेम भूल जायेगी। 

  मन की दुर्बलता फिर उसे भटकाने का प्रयास करने लगी। लक्ष्मी के बिना जीवन की असमर्थता गिनाने लगी। स्वार्थ की दुर्बलता और प्रेम के त्याग के मध्य जंग में आखिर जीत प्रेम के त्याग की हुई। 

  " लक्ष्मी। तुम मुझसे कितना भी छिपा लो। पर सत्य मैं पता कर ही लूंगा। तुम्हें तुम्हारे प्रेम से जरूर मिला दूंगा। यह मेरे सच्चे प्रेम का वायदा है। और सच्चा प्रेम कभी नहीं हारता। उसकी हार में भी एक जीत छिपी होती हैं।" 

  विशाल ने ऊपर की बात लक्ष्मी से अपने मुंह से नहीं बोली। लक्ष्मी उसकी मन से उठी आवाज को सुन नहीं सकती थी। उसे सुनने के लिये प्रेम की जरूरत होती है। और लक्ष्मी का प्रेम विशाल तो नहीं है कि उसके मन की आवाज को वह समझ सके। 

   विशाल के प्रेम ने मन ही मन जो वायदा किया है, क्या वह पूरा हो पायेगा। उसे लक्ष्मी के प्रेमी के बारे में भला कौन बता सकता है। एक सत्य यह भी है कि प्रेमी एक बार मन में जो ठान ले, उसे हर हाल में पूरा करता ही है। विशाल भी प्रेम में बलिदान करेगा। लक्ष्मी को उसके प्रेमी से मिला ही देगा। इस असंभव जैसी बात पर भी विश्वास करने के पर्याप्त आधार हैं। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'