वो अवि को लेकर घर पहुंच जाते है। मै मम्मी जी से  बहुत विनती करती हूँ। मेरे अवि को मुझे दे दीजिए मैं उसके बगैर जी नही पाऊंगी। लेकिन मम्मी जी ने साफ साफ लफ्जों मे कह दिया अवि तो यही रहेगा तुम्हें आना है तो तुम आ सकती हूँ।

मै खाली हाथ असहाय वापस अपने घर लौट आती हूँ।
मै वापस खाली हाथ आकर घर का दरवाजा बँद करके दरवाजे से पीठ करके टिककर बैठ जाती हूँ अपनी किस्मत पर रोती हूँ। मै एक बेटी ,एक बहु ,माँ बनकर अपने हालातों से लड़कर अपनी नई राह मे चल रही थी। मगर उन लोगो ने मेरे मनसूबे पर पानी फेर दिया। मुझे तोड़ने के लिए ये नया हत्कंडा अपनाया और कामयाब भी हो गए। मै वहाँ से उठकर
बिस्तर पर आकर ओंधे मुहँ लेटकर खूब रोती हूँ।
मै एक माँ हूँ न , मै सब कुछ सह सकती हूँ , मगर अपने बच्चे से जुदाई कैसे बर्दाश्त करूँ।

घर मे चारो तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। मुझे अवि की बेहद याद आ रही थी। ऐसे लग रहा था जैसे वो रो रहा है।उसका चेहरा मेरे आँखो के सामने घूम रहा था। मै रात भर करवटे बदलती रही। मेरे लिए सब तरफ से दरवाजे बँद हो गए थे। जिस घर की चौखट पर न जाने की कसम खाई थी। अब मुझे अपने बच्चे के लिए उसी नर्क मे जाना पड़ेगा। सारी रात मै बिस्तर मे खुले नैन पड़ी रही। ऐसे लग रहा था जैसे सब कुछ खत्म हो गया। अब तो मेरी सब्र का बाण भी टूट रहा था।

डोर बेल बजते ही मेरी अर्द्धतन्द्रा जागी। अपने बगल मे बिस्तर मे हाथ फेरा और  अवि को ना पाकर जल्दी से घबराकर ,कही बिस्तर से गिर तो नहीं गया उठकर अवि को जमीन मे ढूढती हुई देखती हूँ। 
तभी मेरी आँखो के सामने कल रात की सारी घटना मेरे आँखो के सामने घूमने लगी।

मेरे अंतःकरण ने बोला क्यों पागल हो रही हो ??अवि तो है ही नहीं , किसे ढूढ रही हो?? हिम्मत से और बुद्धि से काम लो। जिंदगी एक जंग है। उसे तुम्हें जीतना होगा। बुजदिल हारने की बात करते है। 

हाँ ठीक ही तो कह रही हो , लेकिन मै भी तो इंसान हूँ कोई पत्थर तो नहीं। मै सह सहकर थक गई हूँ।

तो क्या मै बुजदिल हो गई हूँ?? मै अपने आप से यह सवाल दोहराती हूँ।

फिर से दोबारा डोर बेल बजती है। मेरा ध्यान दरवाजे 
पर बज रही घंटी पर जाता है। मै जाकर दरवाजा खोलती हूँ। मेरे सामने रोमा खड़ी थी।
रोमा को देखते ही ध्यान आया कि सुबह हो गई।

क्या दीदी आज आपने दरवाजे खोलने मे बड़ी देर लगा दी ?? आज आप तैयार नहीं हुए अभी तक स्कूल नहीं जाना आपको?? घर मे घुसते ही रोमा ने कहा।

अभी तक अवि उठा नहीं है क्या दीदी ??  उस शैतान की आवाज नहीं आ रही है। नहीं तो मुझे देखते ही इशारो से बाजार जाने की जिद्द करता है। रोमा आते ही अपने सवालों की झड़ी लगा दी। मै उससे क्या कहती। एक महीने मे रोमा से अपनापन लगने लगा था और जिनके साथ सालो से जीवन व्यापन कर रही थी वो मेरे साहस को तोड़ने  मे लगे हुए थे।

रोमा ने मुझे पुकारा। दरवाजे पर खड़े खड़े दीदी क्या सोच रहे हो आप ?? रोमा आकर दरवाजा बंद करती है। मेरे सामने आकर मुझे हिलाकर मुझसे फिर से पूछती है। क्या हुआ दीदी आपको ??आपकी तबियत ठीक नहीं है क्या??क्या हुआ.दीदी बोलो ना??
रोमा पूरे घर मे घूमकर आती है। दीदी अवि कहाँ है??
अवि नहीं है घर पर क्या ?? कही गया है क्या?? जरूर मनु भैया आए होंगे ??  वो ही अवि को घूमाने ले गए होंगे।

वो कहकर अवि के बिखरे खिलौने को उठाकर रखने लगी। मैंने रोमा को  बैग देते हुए कहा" सुन मेरे और अवि के सारे समान अलमारी से निकाल करके इसमे भर दे।"

आप कही जा रहे हो क्या दीदी?? रोमा ने पूछा
हाँ अपने  ससुराल जा रही हूँ । अब तुझे भी आना नहीं होगा। मैंने रूखापन से उसे जवाब दिया।

मेरी बात सुनकर रोमा भी थोड़ी मायूस हो गई। अवि का ख्याल रखते हुए उसे भी अवि से लगाव हो गया था।

मै अपना सारा समान रोमा के साथ मिलकर समेटती हूँ। बचे हुए सब्जी अनाज और पैसे रोमा को देती हूँ और उसे दिल से धन्यवाद देती हूँ , कि उसने मेरे जरूरत के समय मे मेरा साथ दिया।

भैया को फोन करके बताती हूँ ,सोचा था भैया रोकेंगे तो रूक जाऊँगी। मगर भैया भी मेरे वापस ससुराल जाने के फैसले से बहुत खुश होते है। 

भैया ने कहा वे काम से बाहर गए हुए है , नहीं तो  मुझे खुद ससुराल छोड़कर आते। घर बँद कर के चाभी रोमा को दे देने को कहते है।

मै अपने मन को समझाती हुई पहुंँच गई अपने ससुराल , जहाँ मैने नहीं जाने की कसम खाई थी।
आज एक लाचार माँ उसी चौखट पर खड़ी थी।

मेरे ससुराल पहुंचते ही सब अपनी जीत की हँसी चेहरे पर सजाकर कुटिल मुस्कान से देख रहे थे।

अवि मुझे देखते ही चिल्ली मारकर रोता है। मेरे पास आने के लिए झटपटाने लगता है। मेरे गोदी मे आते ही  एकदम चुप हो जाता है। एक बच्चे को अपनी माँ से जुदा करने का इन लोगो ने घिनौना अपराध किया है। और उसपर लज्जा भी नहीं आ रही थी।

मेरे घर वापस आते ही इन लोगो को फ्री फंड की बाई मिल जाती है। अब किसी को डर तो था नही।
एक दो दिन मुझे अपने ही घर मे रहने मे अटपटा लगा।

  लेकिन जिंदगी की गाड़ी पहले की ही तरह चलने लगी। मगर सबकी मनमर्जियां काफी बढ गई थी।
पहले भी किसी से भी मदद का कोई सहारा नहीं था।और अब तो सब बात खुलेआम हो गई थी। मेरे ऊपर सभी शेर की तरह दहाड़ते। रात को गर्मा गर्म ही खाना चाहिए था। कोई फिक्सड टाईम भी नहीं था। किसी कारणवश खाना पहले बना कर रख देती। तो इन लोगों की जली कटी बाते सुनने मिलती। 

होली के दिन की बात है। उस दिन भैया भाभी ने छोटा सा फंक्शन घर मे रखा था। यूँ तो मुझे होली खेलना बिल्कुल पसंद नहीं है। मगर मैनै सोचा बुलाए है तो जाना चाहिए इसी बहाने माँ से मिलना भी हो जाएगा।मेरा मन भी बहल जाएगा। मुझे , अवि और प्रेम जी को बुलाया था। मै शाम को तैयार होकर अवि को लेकर जाने लगती हूँ। प्रेम जी तो आड़ेदिन ही नशे मे टल्ली रहते है। आज तो होली थी दो चार पैग और मार लिए कोई होश नहीं अपनी ही दुनिया मे मदहोश पड़े थे। 

जैसे ही मै अवि को गोद मे लेकर जाने के लिए निकलती हूँ । मेरे प्यारे देवर जी जो कभी भाभी ..भाभी कहकर मेरे आगे पीछे घूमते थे।वो मुझसे अवि को जाते वक्त छिनने लग जाते है। उन लोगो को लगता है कि अगर मै अवि को लेकर घर से कही  गई , तो मै कही  वापस ही न आऊँ। मै नहीं मानी तो उनकी हिम्मत इतनी बढ गई कि उन्होंने मुझपर हाथ उठा दिया। मै अवाक् होकर देखती ही रह गई। सही कहते है दुनिया वाले जिसके पति की कोई इज्ज़त नहीं होती है  उसकी पत्नी की इज्जत धूमिल कर दी जाती है। उस वक्त तो ऐसा लगा कि मुझे मर जाना चाहिए। मै भी कितनी निर्लज्ज हूँ इतनी बेइज्जती होने के बाद भी मै इन लोगो के साथ रह रही हूँ। इस आदमी की वजह से मेरी इज्ज़त दो कौड़ी की हो गई है। 

क्रमश: