अखंड भारत का सपना खंडित होते दिखता है
ईमानदारो कि ईमान सरेआम बिकते दिखता है
जो ना हुआ गुलामी में अब वह भारत में होता है
और अब तो भारत का बच्चा-बच्चा क्रंदन करते दिखता है।
अब फूल जैसी हथेली को भी श्रम करना पड़ता है
जब होता है देश में अन्याय तब कलम उठाना पड़ता है
अब किस पर करें इतवार और किसको कहे बेकार
क्योंकि अब तो हर कोने कोने में बेईमान सब ही रहता है।
भारत मां के ऊपर मानो जैसे टूट पड़ा है कहर
भारत मां के ह्रदय तल में मानो जैसे चल रहा समुंद्र की लहर
मानो भारतमाता हमसे रोते-रोते यह कहती है
की इससे अच्छा हमको तुम दे देता दो पुरियों में जहर।
वीर सपूतों को जब दिखती है भारतमाता तीरंगों में
तब क्रंदन होने लगती है उनके पूरे अंगों में
देख लिपटे तिरंगो में अपने वीर सपूतों को
मानो अनल लिपट गया है भारत मां के अंगों में।
स्वरचित एवं मौलिक
सुशील चौधरी
जंदाहा वैशाली बिहार

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