बेपनाह मोहब्बत मुझसे थी..
घर किसी और का बसाना था..
नहीं लकीरें मेरे नाम की हथेली में
यह भी अच्छा बहाना था !
दूर से आवाज देकर करते रहे
रस्मे वफा की पूरी..
आकर हाथ थाम लेते
अगर साथ निभाना था !
नहीं लकीरें मेरे नाम की हथेली में..
यह भी अच्छा बहाना था !
मिले हो फिर से इसबार..
जमी -आसमां का फासला लेकर..
न तुम्हें नीचे आना है..
न मुझे ऊपर बुलाना था !
नहीं लकीरें मेरे नाम की हथेली में..
यह भी अच्छा बहाना था !
लोग मार रहे थे पत्थर..
मेरे शीशे के घर पर…
तुम दूर खड़े थे..
तुम्हें अपना घर बचाना था !
नहीं लकीरें मेरे नाम की हथेली में..
यह भी अच्छा बहाना था !
कैसे खुश रहोगे तुम ?
कलयुग में कृष्ण बनकर..
न रूक्मिणी को साध पाओगे..
न राधा को भुलाना था !
नहीं लकीरें मेरे नाम की हथेली में..
यह भी अच्छा बहाना था !
मेरा कत्ल कर रहा तू..
मेरी जिंदगी में आकर ..
कत्ल का इल्ज़ाम भी
मुझ पर ही लगाना था !
नहीं लकीरें मेरे नाम की हथेली में..
यह भी अच्छा बहाना था !
पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार

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